ईरान के साथ शांति वार्ता ठप! अमेरिका ने रूसी तेल पर लगे बैन में बढ़ाई छूट, भारत को मिलेगा फायदा

ईरान के साथ तनाव के बीच अमेरिका ने समुद्र में फंसे रूसी कच्चे तेल पर लगे प्रतिबंधों में एक महीने की और छूट दे दी है. यह फैसला शांति वार्ता रुके होने के समय पर लिया गया है.

Sonee Srivastav

नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है. इसी बीच अमेरिका ने समुद्र में फंसे रूसी कच्चे तेल पर लगे प्रतिबंधों में एक महीने की और छूट दे दी है. अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता रुके होने के समय पर यह फैसला लिया गया है. 

18 मई से लागू हुआ नया लाइसेंस 

अमेरिकी वित्त विभाग ने जनरल लाइसेंस 134सी जारी करके पुरानी छूट को बढ़ा दिया है. यह नया लाइसेंस 18 मई से लागू हो गया है और 17 जून तक रहेगा. यह छूट केवल उन रूसी तेल के जहाजों पर लागू होगी जो 17 अप्रैल या उससे पहले समुद्र में थे. विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय ने साफ किया है कि ईरान, उत्तर कोरिया, क्यूबा या रूस नियंत्रित यूक्रेन क्षेत्रों से जुड़े किसी भी लेन-देन को इस छूट में शामिल नहीं किया गया है.

पहले की छूटें

इससे पहले मार्च में अमेरिका ने भारत समेत कई देशों को रूसी तेल खरीदने की सुविधा दी थी. बाद में इसे बढ़ाया गया, लेकिन 16 मई को छूट समाप्त होने वाली थी. अब इसे एक बार फिर 30 दिन के लिए बढ़ा दिया गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ईरान-इजरायल तनाव के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति में आने वाली परेशानी को ध्यान में रखकर उठाया गया है. इसका मकसद तेल के दामों को स्थिर रखना है.

भारत का रुख साफ

भारत ने कहा है कि अमेरिकी प्रतिबंधों में छूट मिले या न मिले, उसका रूस से तेल खरीदने का फैसला नहीं बदलेगा. पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा कि भारत के फैसले पूरी तरह व्यावसायिक जरूरतों और ऊर्जा सुरक्षा पर आधारित है.

शर्मा ने जोर देकर कहा, “हम पहले भी रूस से तेल खरीदते थे, प्रतिबंध के दौरान भी खरीद रहे हैं और आगे भी खरीदते रहेंगे.” उन्होंने बताया कि भारतीय रिफाइनरी कंपनियां लंबे अनुबंधों के जरिए पर्याप्त तेल सुरक्षित कर रही हैं और आपूर्ति में कोई कमी नहीं है.

रूसी तेल का महत्व

फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस पर कई प्रतिबंध लगे, लेकिन तेल पर सीधा प्रतिबंध नहीं था. सस्ते दामों के कारण रूसी तेल भारत के कुल आयात का बड़ा हिस्सा बन गया. इससे भारत को ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और घरेलू तेल कीमतें नियंत्रित रखने में मदद मिली.

अमेरिका का यह फैसला दिखाता है कि वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने की जरूरत अभी बनी हुई है. हालांकि, छूट अस्थायी है और भविष्य में स्थिति बदल सकती है.

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