ईरान ने भारत के तेल टैंकर को क्यों टारगेट किया? रिश्ते खराब नहीं हुए, ये है असली कारण

ईरान में अली खामेनेई की मौत के बाद सत्ता की जंग तेज हो गई है. आईआरजीसी और विदेश मंत्रालय के बीच तीखा टकराव शुरू हो गया, जिसकी झलक अब होर्मुज जलडमरूमध्य में गोलीबारी के रूप में दिख रही है. सेना कूटनीतिक फैसलों को खुलेआम चुनौती दे रही है, जिससे इलाका और अस्थिर हो गया है.

Goldi Rai
Edited By: Goldi Rai

नई दिल्ली: होर्मुज जलडमरूमध्य में शनिवार को भारतीय जहाज पर फायरिंग की गई घटना ने समुद्री सुरक्षा को नई चुनौती दी है. यह मामला महज जल क्षेत्र का तनाव नहीं है, बल्कि ईरान के अंदर सत्ता की जंग का स्पष्ट नतीजा माना जा रहा है. मीडिया को भारतीय खुफिया सूत्रों ने बताया कि भारतीय टैंकरों के पास हुई ‘वॉर्निंग फायरिंग’ दरअसल ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची की कूटनीतिक लाइन के खिलाफ सेना की सीधी चुनौती थी. ईरान में इस समय सत्ता का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है. अमेरिका-इजरायल हमले में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद वहां एक बड़ा नेतृत्व शून्य पैदा हो गया है, जिससे पूरा सिस्टम अस्थिर हो गया है.

सेना अपने ही विदेश मंत्रालय के खिलाफ क्यों?

इसी अस्थिरता के बीच ईरान की सबसे ताकतवर सैन्य संस्था आईआरजीसी और विदेश मंत्रालय आमने-सामने आ गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, आईआरजीसी प्रमुख अहमद वहिदी और उनकी टीम को लगता है कि विदेश मंत्री अराघची पश्चिमी देशों के साथ बातचीत में ‘जरूरत से ज्यादा नरम’ रुख अपना रहे हैं. आईआरजीसी का मानना है कि परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल सिस्टम और हिजबुल्लाह-हमास जैसे संगठनों से जुड़े फैसलों में कूटनीतिक नरमी देश के हितों के खिलाफ है. यही वजह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने को लेकर विदेश मंत्रालय की लाइन को सेना ने खुले तौर पर चुनौती दी. आईआरजीसी से जुड़े मीडिया प्लेटफॉर्म ने भी अराघची के बयान की आलोचना की और इसे ‘खतरनाक झुकाव’ बताया. इस आंतरिक टकराव का सबसे बड़ा असर इस्लामाबाद में चल रही अमेरिका-ईरान बातचीत पर भी दिखा है.

आईआरजीसी के नाराजगी की क्या है असल वजह?

जानकारी के मुताबिक, आईआरजीसी चाहता है कि उसके करीबी अधिकारी मोहम्मद-बाकर जोलगदर को शांति से जुड़ी बातचीत टीम में शामिल किया जाए, ताकि पूरी वार्ता पर उसका सीधा नियंत्रण रहे. लेकिन विदेश मंत्री अराघची ने इसका विरोध किया है, यह कहते हुए कि जोलगदर के पास बातचीत का अनुभव नहीं है. इस खींचतान ने इस्लामाबाद की बातचीत को एक ‘तीन तरफा जंग’ बना दिया है- एक तरफ ईरानी कूटनीतिज्ञ, दूसरी तरफ आईआरजीसी के हार्डलाइनर और तीसरी तरफ बाहरी मध्यस्थ.

ईरानी सेना क्यों है परेशान?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, खामेनेई के बाद बने इस सत्ता शून्य ने आईआरजीसी को और ज्यादा आक्रामक बना दिया है. उसे डर है कि अगर कूटनीतिक समझौता हो गया तो उसकी ताकत और फंडिंग कमजोर हो सकती है. इसी वजह से होर्मुज जैसे रणनीतिक इलाके पर उसका नियंत्रण और सख्त हो गया है. इसका सीधा असर भारत समेत पूरी दुनिया पर पड़ सकता है. अब ईरान एकजुट फैसले लेने वाला देश नहीं रह गया है, बल्कि वहां अलग-अलग ताकतें अलग-अलग दिशा में खींच रही हैं. ऐसे में कोई भी कूटनीतिक वादा जमीनी स्तर पर सैन्य कार्रवाई से पलट सकता है.

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