'दो कौड़ी का इंसान' और 'फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा' क्यों कहा जाता है? जानिए इस मशहूर मुहावरे का हैरान कर देने वाला इतिहास
"मैं उसे फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा" और "उसके पास फूटी कौड़ी भी नहीं है" जैसे मुहावरे तो आपने जरुर ही सुने होगें, लेकिन इन मुहावरो का सही अर्थ बहुत ही कम लोगों को पता है.

नई दिल्ली: हम रोजमर्रा की बातचीत में अक्सर सुनते हैं कि "मैं उसे फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा" या "उसके पास फूटी कौड़ी भी नहीं है." यह मुहावरा आज भी खूब बोला जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई और इसका असली अर्थ क्या है.
क्या होती थी कौड़ी?
प्राचीन समय में जब सिक्कों का चलन हर जगह नहीं था, तब कई क्षेत्रों में कौड़ी का इस्तेमाल मुद्रा के रूप में किया जाता था. कौड़ी समुद्र में मिलने वाला एक छोटा शंखनुमा खोल होता था, जिसे लेन-देन के लिए उपयोग में लाया जाता था.
उस समय इसकी निश्चित कीमत होती थी और लोग इससे छोटी-मोटी खरीदारी भी करते थे. अगर कोई कौड़ी टूट जाती थी या उसमें दरार आ जाती थी, तो उसे 'फूटी कौड़ी' कहा जाता था. ऐसी कौड़ी का बाजार में लगभग कोई मूल्य नहीं माना जाता था.
पुराने समय की मुद्रा व्यवस्था
उस दौर की मुद्रा व्यवस्था आज से बिल्कुल अलग थी. छोटी-छोटी इकाइयों को जोड़कर बड़ी राशि बनती थी. कौड़ी से शुरुआत होकर दमड़ी, ढेला, पाई, पैसा, आना और फिर रुपया तक का हिसाब चलता था. इसलिए कौड़ी को सबसे छोटी और सबसे कम मूल्य वाली इकाइयों में गिना जाता था.
कैसे बना यह मशहूर मुहावरा?
क्योंकि फूटी कौड़ी की कीमत सबसे कम मानी जाती थी, इसलिए जब किसी व्यक्ति के पास 'फूटी कौड़ी भी नहीं' होती थी, तो इसका अर्थ होता था कि उसके पास बिल्कुल भी धन नहीं है. वहीं "फूटी कौड़ी भी न देना" का मतलब है कि किसी को अपने पास से सबसे छोटी या मामूली चीज भी न देना.
इसी तरह "दो कौड़ी का इंसान" जैसे मुहावरे भी उसी दौर की मुद्रा व्यवस्था से जुड़े हुए हैं. इनका उपयोग किसी ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है, जिसे सम्मान या महत्व के योग्य नहीं माना जाता.
आज भी जिंदा हैं ये मुहावरे
भले ही आज कौड़ी का इस्तेमाल मुद्रा के रूप में नहीं होता, लेकिन उससे जुड़े मुहावरे आज भी हमारी भाषा का अहम हिस्सा हैं. यही वजह है कि सदियों पुरानी यह विरासत आज भी लोगों की बोलचाल में उसी तरह जीवित है और भाषा को रोचक बनाती है.


