लिव-इन रिलेशनशिप पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सहमति से बने शारीरिक संबंध को दुष्कर्म मानने से किया इनकार

छत्तीसगढ़ से हाल में एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति से बने शारीरिक संबंधों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. जहां एक महिला द्वारा निचली अदालत से आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी.

Yashika Jandwani

रायपुर: छत्तीसगढ़ से हाल में एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति से बने शारीरिक संबंधों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने कहा कि अगर दो वयस्क लंबे समय तक लिव-इन संबंध में साथ रहते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध बनते हैं, तो सामान्य परिस्थितियों में उन्हें सहमति से बना संबंध माना जाएगा. वहीं ऐसे मामलों में अगर बाद में पुरुष शादी करने से इनकार कर देता है, तो ऐसे मामलों को बलात्कार का मामला नहीं माना जाएगा. 

महिला की चुतौनी पर सुनाया ये फैसला 

न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने यह फैसला एक महिला की अपील पर सुनाया है. बता दें, महिला ने निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी. हालांकि, हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपी की रिहाई बरकरार रखी. 

महिला नहीं व्यक्ति पर लगाये ये आरोप 

मामले के अनुसार, 40 वर्षीय महिला ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2019 में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उसकी मुलाकात आरोपी से हुई थी. महिला का कहना था कि आरोपी ने शादी का भरोसा देकर उससे संबंध बनाए और दोनों करीब दो वर्षों तक साथ रहे. लेकिन बाद में आरोपी ने परिवार की असहमति का हवाला देते हुए शादी से इनकार कर दिया. महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उसके साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए गए, जिसके बाद भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया गया. 

भाई ने दी गवाई 

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि महिला ने अपनी जिरह में यह स्वीकार किया था कि वह विवाद के समझौते के लिए आर्थिक राशि लेने को तैयार थी.  अदालत ने यह भी नोट किया कि दोनों पक्षों के बीच समझौते की कोशिश हुई थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सकी. इसके अलावा, महिला के भाई की गवाही में भी यह सामने आया कि दोनों के बीच संबंध प्रेम संबंध के चलते विकसित हुए थे.

हाईकोर्ट का अहम फैसला 

हाईकोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों का भी उल्लेख किया, जिनमें जबरन या अप्राकृतिक यौन संबंध के स्पष्ट संकेत नहीं मिले. इसके साथ ही अदालत ने कहा कि लंबे समय तक साथ रहने वाले वयस्कों के मामले में संबंध की अवधि, दोनों पक्षों का व्यवहार और परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं. इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि यह संबंध सहमति से था और केवल शादी न होने के कारण इसे बलात्कार नहीं कहा जा सकता. इसी आधार पर महिला की अपील खारिज करते हुए आरोपी को दी गई राहत को बरकरार रखा गया.

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