नई दिल्ली: फिल्म 'धुरंधर: द रिवेंज' में हमजा अली मजारी दाऊद इब्राहिम को मारने की कोशिश करता है. वह उसकी त्वचा पर सांद्रित पारे की एक बूंद डाल देता है. फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि जमील जमाली ने बड़े साहब से हाथ मिलाते समय पारा का इस्तेमाल किया. कुछ घंटों बाद खाने में दिक्कत होने लगी और अंत में वे जीवन भर बिस्तर पर रह गए.
फिल्म के अंत में प्रशिक्षण सीन में बताया गया कि पारे की एक बूंद त्वचा में घुसकर खाद्य विषाक्तता जैसे लक्षण पैदा कर सकती है. क्या वास्तविक जीवन में पारा इतना आसान और तेज जहर है? आइए न्यूरोलॉजिस्ट की राय से समझें.
आकाश हेल्थकेयर के न्यूरोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. मधुकर भारद्वाज बताते हैं कि पारा मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचाने वाला जाना-माना जहर है. फिर भी फिल्मों में इसका चित्रण अक्सर नाटकीय बनाया जाता है.
पारा विषाक्तता धीरे-धीरे हो सकती है, खासकर लंबे समय तक संपर्क में रहने पर। यह ज्यादातर मिथाइलमरकरी जैसे कार्बनिक पारा यौगिकों से होती है, जो शरीर में जमा हो जाते हैं. शुरुआती लक्षण हल्के होते हैं जैसे- चिड़चिड़ापन, थकान, सिरदर्द और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी. बाद में कंपकंपी, स्मृति की समस्या, मूड में बदलाव और समन्वय की कमी हो सकती है.
डॉ. भारद्वाज स्पष्ट करते हैं कि तरल पारा (एलिमेंटल मरकरी) त्वचा से आसानी से नहीं सोखा जाता. फिल्म में दिखाया गया एक बूंद त्वचा पर डालकर तुरंत घातक प्रभाव पैदा करना पूरी तरह सही नहीं है. असली खतरा पारे के वाष्प को सांस से अंदर लेने या उसे निगलने से होता है. त्वचा पर साधारण संपर्क से गंभीर विषाक्तता की संभावना बहुत कम है.
पारा का असर रासायनिक रूप, मात्रा, संपर्क का तरीका और समय पर निर्भर करता है. एक बार हाथ मिलाने से जीवन भर बिस्तर पर पड़ जाना जैसा नाटकीय परिणाम वास्तविकता से काफी अलग है.
शरीर में पारे की जांच रक्त, मूत्र और बालों के टेस्ट से की जा सकती है. न्यूरोलॉजिकल जांच और इमेजिंग से नुकसान की सीमा पता चलती है. उपचार में सबसे पहले पारे के संपर्क को रोकना जरूरी है. कीलेशन थेरेपी से कुछ प्रकार के पारे को शरीर से निकाला जा सकता है.
एक बार तंत्रिका तंत्र को गंभीर नुकसान हो जाए तो कुछ प्रभाव स्थायी रह सकते हैं. फिर भी जल्दी पहचान और इलाज से स्थिति को रोका जा सकता है. तंत्रिका पुनर्वास और सहायक उपचार मदद करते हैं.
फिल्म में एक बूंद पारा को 'धीमा जहर' दिखाया गया है जो चुपचाप काम करता है. वास्तव में पारा खतरनाक है, लेकिन इसका असर आमतौर पर निरंतर संपर्क, दूषित भोजन या औद्योगिक वातावरण से होता है, न कि एक बार की नाटकीय घटना से. डॉ. भारद्वाज सलाह देते हैं कि असली खतरे जैसे दूषित मछली, पुराने थर्मामीटर या स्किन क्रीम के बारे में जागरूकता ज्यादा जरूरी है. First Updated : Monday, 30 March 2026