बड़ा मंगल और शनि जयंती, ज्येष्ठ माह में देव कृपा पाने का खास समय

ज्येष्ठ माह 2 मई से शुरू होकर इस बार अधिकमास के कारण लंबा रहेगा और यह भीषण गर्मी के साथ जल संरक्षण, दान और संयम का संदेश देता है. इस महीने में सूर्य, वरुण, हनुमान और शनि देव की पूजा, निर्जला एकादशी जैसे व्रत और जरूरतमंदों की सेवा को विशेष पुण्यदायक माना गया है.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

हिंदू पंचांग के मुताबिक वर्ष 2026 में ज्येष्ठ माह की शुरुआत 2 मई, शनिवार से हो गई है. यह माह 31 मई तक जारी रहेगा. इस बार विशेष संयोग यह है कि अधिकमास पड़ने के कारण ज्येष्ठ दो महीने तक रहेगा. हिंदू कैलेंडर का यह तीसरा महीना माना जाता है, जो भीषण गर्मी और तपती धूप के लिए प्रसिद्ध है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह महीना हमें जल के महत्व को समझने, उसे बचाने और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की प्रेरणा देता है. 

 चरम पर होता है सूर्य देव का प्रभाव

इसी दौरान गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी जैसे महत्वपूर्ण पर्व मनाए जाते हैं, जो संयम, त्याग और दान की भावना को मजबूत करते हैं. ज्येष्ठ महीने में सूर्य देव का प्रभाव अपने चरम पर होता है. तेज धूप और बढ़ती गर्मी के कारण ही इसे ‘ज्येष्ठ’ यानी श्रेष्ठ या बड़ा कहा गया है. मान्यता है कि इस अवधि में किए गए धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ और दान से व्यक्ति को मानसिक शांति के साथ-साथ अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. यह समय आत्मसंयम और धैर्य बनाए रखने का भी संदेश देता है.

इस माह में सूर्य देव और जल के देवता वरुण देव की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है. गर्मी के चरम पर होने के कारण जल की अहमियत और बढ़ जाती है. इसलिए प्यासे लोगों और जीव-जंतुओं को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार, इस समय जल की कमी स्वाभाविक रूप से बढ़ती है. ऐसे में जल संरक्षण करना और जल स्रोतों की स्वच्छता बनाए रखना धार्मिक कर्तव्य के रूप में देखा जाता है. वरुण देव की आराधना से जीवन में शीतलता, संतुलन और समृद्धि का आगमन होता है, जबकि सूर्य उपासना से ऊर्जा और सकारात्मकता मिलती है.

किससे जुड़ा है ज्येष्ठ माह का संबंध? 

ज्येष्ठ माह का संबंध हनुमान जी और शनि देव की पूजा से भी गहराई से जुड़ा है. मान्यता है कि इस महीने के ‘बड़े मंगल’ पर हनुमान जी की विशेष आराधना की जाती है, क्योंकि इसी समय उनकी भगवान राम से पहली भेंट हुई थी. वहीं, ज्येष्ठ अमावस्या को शनि जयंती के रूप में मनाया जाता है, जो शनि देव के जन्म का प्रतीक है. इन दोनों देवताओं की पूजा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं. इस दौरान भंडारे आयोजित करना, ठंडा जल या शरबत बांटना और जरूरतमंदों की सेवा करना विशेष रूप से पुण्यदायक माना गया है.

इस महीने में कुछ नियमों का पालन करना भी लाभकारी बताया गया है. खान-पान में सादगी रखना, हल्का और सुपाच्य भोजन करना व दिन में अधिक सोने से बचना स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है. साथ ही, गर्मी से राहत देने वाली वस्तुओं जैसे पानी से भरा घड़ा, पंखा, छाता, सत्तू आदि का दान करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है.

निर्जला एकादशी का व्रत इस माह का सबसे महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन बिना जल ग्रहण किए व्रत रखने से वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है. कुल मिलाकर, ज्येष्ठ माह हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखें, सेवा भाव अपनाएं और जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहें. ऐसा करने से जीवन में सुख-समृद्धि और सकारात्मकता बनी रहती है.

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