बिहार की राजनीति में एक नाम वर्षों से अपने अनुशासन, ईमानदारी और संगठनात्मक क्षमता के लिए जाना जाता है. वो नाम है जगदानंद सिंह. राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के इस कद्दावर नेता को न केवल लालू प्रसाद यादव का बेहद करीबी माना जाता है, बल्कि पार्टी के भीतर उनका कद भी किसी मार्गदर्शक से कम नहीं रहा. अब जब पार्टी नए प्रदेश अध्यक्ष के नाम की घोषणा की तैयारी में है, तो यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह ‘जगदा बाबू’ के युग का अंत है?
सूत्रों के अनुसार, आरजेडी 21 जून को बिहार प्रदेश अध्यक्ष के नए नाम का ऐलान कर सकती है, जबकि 5 जुलाई को राष्ट्रीय अध्यक्ष की घोषणा की जाएगी. पार्टी प्रवक्ता शक्ति यादव ने पुष्टि की है कि जगदानंद सिंह की तबीयत ठीक नहीं है और यही वजह है कि अब उन्हें पार्टी की बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त किया जा सकता है. इस राजनीतिक हलचल के बीच यह जानना जरूरी हो गया है कि आखिर कौन हैं जगदानंद सिंह, और क्यों उन्हें आरजेडी की रीढ़ माना जाता है?
जगदानंद सिंह और लालू प्रसाद यादव की दोस्ती जनता दल के जमाने से शुरू हुई थी. जब 1997 में लालू यादव ने आरजेडी की नींव रखी, तब जगदानंद उनके साथ सबसे पहले खड़े होने वालों में थे. लालू उन्हें प्यार से ‘जगदा बाबू’ कहकर पुकारते हैं. जब राजनीति में कई सहयोगी समय के साथ अलग होते चले गए, तब भी जगदानंद हमेशा लालू के साथ डटे रहे. चाहे चारा घोटाले के दौरान लालू का जेल जाना हो या पार्टी का कमजोर दौर, जगदानंद ने कभी पीठ नहीं मोड़ी.
जगदानंद सिंह का व्यक्तित्व हमेशा अनुशासन और समाजवादी मूल्यों से जुड़ा रहा है. वे ऐसे नेता हैं जो विवादों से दूर रहते हैं और सभी गुटों में सम्मान पाते हैं. जब लालू राजनीति से कुछ समय के लिए अलग हुए, तो जगदानंद ने तेजस्वी यादव को नेतृत्व के लिए तैयार किया और संगठन को मजबूती दी. तेज प्रताप यादव ने भले ही उन्हें ‘हिटलर’ कहा, लेकिन जगदानंद ने जवाब में बस इतना कहा – “मैं सिर्फ लालू प्रसाद के प्रति जिम्मेदार हूं.” यह बयान उनकी निष्ठा और विचारधारा को पूरी तरह स्पष्ट कर देता है.
जगदानंद सिंह नवंबर 2019 से आरजेडी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष हैं. इससे पहले वे छह बार विधायक, एक बार सांसद और राज्य सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. लालू-राबड़ी शासन के दौरान जब वे बिजली मंत्री थे, तब उन्होंने बक्सर के गांवों में बिजली पहुंचाने का सराहनीय कार्य किया, जिससे उन्हें 'बिजुलिया बाबा' की उपाधि मिली. आम लोगों से उनका सीधा जुड़ाव और विकास के लिए किया गया काम आज भी उन्हें जनप्रिय बनाता है.
2019 के लोकसभा चुनाव में जब आरजेडी को करारी हार मिली थी, तब संगठन को दोबारा खड़ा करने की जिम्मेदारी जगदानंद को दी गई. उन्होंने न केवल संगठन को मज़बूत किया, बल्कि तेज प्रताप और तेजस्वी के बीच बढ़ते तनाव को भी संतुलित किया. उनकी नियुक्ति को सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति के रूप में भी देखा गया, खासकर राजपूत समाज को जोड़ने की कोशिश में. 2020 विधानसभा चुनाव में आरजेडी 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जिसका श्रेय काफी हद तक जगदानंद की रणनीति को भी जाता है.
आरजेडी प्रवक्ता का कहना है कि जगदानंद सिंह की सेहत ठीक नहीं है और वे सक्रिय राजनीति से कुछ समय के लिए अलग होना चाहते हैं. हालांकि राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि बदलते राजनीतिक समीकरणों के तहत पार्टी नेतृत्व नई रणनीति और नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ना चाहता है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या जगदा बाबू की भूमिका पूरी तरह समाप्त होगी या वे भविष्य में मार्गदर्शक के रूप में सक्रिय रहेंगे. First Updated : Monday, 19 May 2025