ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। इसका सीधा असर भारतीय सीमेंट इंडस्ट्री पर पड़ रहा है। इंडस्ट्री पहले से ओवरकैपेसिटी के संकट से जूझ रही थी। अब इस युद्ध ने स्थिति को और ज्यादा खराब कर दिया है। लागत तेजी से बढ़ती जा रही है।
सीमेंट बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। पेटकोक, कोल और पैकेजिंग मटीरियल महंगे हो गए हैं। इससे उत्पादन लागत पर दबाव बढ़ गया है। कंपनियों के लिए मुनाफा बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। हालात लगातार चुनौतीपूर्ण बनते जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन लागत में 150 से 200 रुपये प्रति टन तक की बढ़ोतरी हो सकती है। पावर और फ्यूल का हिस्सा पहले से ही करीब 30 फीसदी है। ऐसे में लागत का दबाव और ज्यादा बढ़ेगा। इसका सीधा असर कंपनियों के मार्जिन पर पड़ेगा।
फ्रेट रेट में भी तेजी देखी जा रही है। इसके साथ ही पैकेजिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले पॉलीप्रोपाइलीन बैग महंगे हो गए हैं। यह कच्चे तेल से जुड़े होते हैं। एलपीजी सप्लाई की दिक्कतों ने भी लागत बढ़ा दी है। कुल मिलाकर पैकेजिंग खर्च तेजी से बढ़ रहा है।
कंपनियों के सामने अब कीमत बढ़ाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचा है। अनुमान है कि सीमेंट की कीमत में 4 से 5 फीसदी तक बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि बाजार इसे स्वीकार करेगा या नहीं यह साफ नहीं है। डिमांड और सप्लाई का संतुलन अहम भूमिका निभाएगा।
कंपनियों ने पहले भी कीमत बढ़ाने की कोशिश की थी। चौथी तिमाही में प्रति बैग 15 से 20 रुपये बढ़ाने की योजना बनाई गई थी। लेकिन ओवरसप्लाई के कारण इसे वापस लेना पड़ा। बाजार में प्रतिस्पर्धा काफी ज्यादा बनी हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अप्रैल में प्रति बैग 7 से 8 रुपये तक की बढ़ोतरी हो सकती है। लेकिन इंडस्ट्री में पहले से ज्यादा सप्लाई मौजूद है। यूटिलाइजेशन रेट भी 65 से 70 फीसदी के बीच है। ऐसे में कीमतों को लंबे समय तक बनाए रखना आसान नहीं होगा। First Updated : Monday, 30 March 2026