1 अप्रैल 2026 से लागू हुए अपडेटेड वेज कोड के बाद कर्मचारियों के वेतन और ओवरटाइम के नियमों में बड़ा परिवर्तन आया है. अब निर्धारित कार्य घंटों से ज्यादा काम करने वाले कर्मचारियों को ओवरटाइम के लिए दोगुना वेतन मिलेगा. इस सुधार का मुख्य उद्देश्य वेतन संबंधी नियमों में एकरूपता लाना, पारदर्शिता सुनिश्चित करना और सभी क्षेत्रों में कर्मचारियों के अधिकारों को मजबूत करना है. नए नियमों से विशेष रूप से उन कर्मचारियों को फायदा होने की उम्मीद है जिन्हें लंबी शिफ्ट में काम करना पड़ता है. कंपनियों को अब काम के घंटों का सटीक रिकॉर्ड रखना अनिवार्य हो गया है, जिससे विवाद कम होने और समय पर भुगतान सुनिश्चित होने की संभावना बढ़ गई है.
नए नियमों के तहत, सामान्य काम के घंटों के बाद किए गए किसी भी काम का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य है और इसके लिए रेगुलर रेट से दोगुनी दर पर भुगतान करना होगा. व्यावहारिक रूप से इसका मतलब यह है कि हर एक अतिरिक्त घंटे के काम पर आपको दो घंटे के बराबर सैलरी मिलेगी. यह बदलाव विशेष रूप से उन 'ब्लू-कॉलर' कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत है, जिन्हें अक्सर लंबी शिफ्ट में काम करना पड़ता है.
वेज कोड में एक सप्ताह में अधिकतम 48 घंटे काम करने की सीमा तय की गई है. इसके बाद किया गया कोई भी काम 'ओवरटाइम' माना जाएगा. हालांकि, कंपनियों को शिफ्ट की टाइमिंग तय करने की छूट दी गई है लेकिन साप्ताहिक 48 घंटे की सीमा का हर हाल में पालन करना होगा.
इस नए नियम का एक सबसे बड़ा आकर्षण ओवरटाइम की 'राउंडिंग-ऑफ' व्यवस्था है. अब एक्स्ट्रा काम के छोटे-छोटे हिस्सों को भी गिना जाएगा. अगर कोई कर्मचारी शिफ्ट खत्म होने के बाद 15 से 30 मिनट भी अतिरिक्त काम करता है, तो उसे 30 मिनट का ओवरटाइम माना जाएगा. इससे यह सुनिश्चित होगा कि शिफ्ट खत्म होने के बाद भी रुकने वाले कर्मचारियों को उनके एक्स्ट्रा समय का उचित मुआवजा मिले.
नए ढांचे के तहत वेतन भुगतान के नियमों को भी सख्त किया गया है. अगर कोई कर्मचारी इस्तीफा देता है या उसे नौकरी से निकाला जाता है, तो कंपनी को जल्द से जल्द उसके ओवरटाइम सहित सभी बकाये का पूरा भुगतान करना होगा. इसका मकसद विवादों को कम करना और समय पर पैसा मिलना सुनिश्चित करना है. इसके साथ ही, कंपनियों की जवाबदेही बढ़ाने के लिए उन्हें काम के घंटों का सटीक रिकॉर्ड रखना अनिवार्य कर दिया गया है.
ओवरटाइम में सुधार के साथ-साथ लेबर कोड में सैलरी स्ट्रक्चर को लेकर भी एक बड़ा बदलाव किया गया है. अब किसी भी कर्मचारी की बेसिक सैलरी उसकी कुल सैलरी का कम से कम 50% होनी चाहिए. भले ही इससे पारदर्शिता बढ़ेगी, लेकिन बेसिक सैलरी बढ़ने से प्रॉविडेंट फंड और ग्रेच्युटी में आपका वैधानिक योगदान भी बढ़ जाएगा. इसके चलते आपकी इन-हैंड या टेक-होम सैलरी में थोड़ी कमी आ सकती है, लेकिन इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि आपको भविष्य में बेहतर रिटायरमेंट फंड मिलेगा.
इस बदलाव का असर अलग-अलग कर्मचारियों पर अलग-अलग तरीके से पड़ेगा. इस नियम का सबसे ज्यादा फायदा ब्लू-कॉलर वर्कर्स वर्ग को होगा, क्योंकि उनके लिए ओवरटाइम के नियम स्पष्ट हो गए हैं और डबल पेमेंट अनिवार्य कर दिया गया है. अगर नियम सख्ती से लागू होते हैं, तो इनकी मंथली कमाई में भारी इजाफा हो सकता है.
व्हाइट-कॉलर एम्प्लॉइज को इसका फायदा सीमित ही मिलेगा, क्योंकि कॉरपोरेट में कई रोल ओवरटाइम पे के दायरे में नहीं आते हैं. लंबे समय तक काम करने का मतलब यह नहीं होगा कि उनकी इनकम भी बढ़ेगी, हालांकि पीएफ कटने से उनकी रिटायरमेंट सेविंग्स जरूर बेहतर हो जाएगी.
यहां यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि लेबर कोड राज्य स्तर पर लागू किए जाते हैं. भले ही केंद्र सरकार ने इसका ढांचा तैयार कर दिया है, लेकिन इसका वास्तविक क्रियान्वयन इस बात पर निर्भर करेगा कि अलग-अलग राज्य इन नियमों को कब अपनाते और नोटिफाई करते हैं. राज्य इसमें अपनी भूमिका निभाते रहेंगे, जिसमें तिमाही आधार पर ओवरटाइम की सीमा तय करना शामिल है, जो आमतौर पर तीन महीने में 125 से 144 अतिरिक्त घंटों के बीच होती है. First Updated : Sunday, 26 April 2026