31 सप्ताह के गर्भपात की अनुमति मिलने के बाद बड़ा सवाल, कितनी देर बाद गर्भपात कराना असंभव?

सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात की अनुमति के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. इस फैसले में, कोर्ट ने 31 हफ्तों में गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी. यह जानकर हैरानी हो सकती है कि इसी मामले के संबंध में, लड़की ने दो बार आत्महत्या का प्रयास किया था.

Shraddha Mishra

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात की अनुमति के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. इस फैसले में कोर्ट ने 31 हफ्तों में गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी. एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल की एक नाबालिग लड़की को 31 हफ्तों लगभग सात महीने तक पहुंच चुके एक अवांछित गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दी.

यह फैसला सुनाते हुए, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल ने कहा कि कोर्ट को किसी भी महिला विशेषकर किसी नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ को पूरा करने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए. कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह प्रक्रिया AIIMS, दिल्ली में की जाए और सभी जरूरी सावधानियों का पालन किया जाए.

31 हफ्तो में गर्भपात की मंजूरी

यह जानकर हैरानी हो सकती है कि इसी मामले के संबंध में लड़की ने दो बार आत्महत्या का प्रयास किया था. एक ऐसा मामला जिसे कोर्ट ने अत्यंत गंभीरता से लिया. कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह प्रक्रिया AIIMS, नई दिल्ली में सभी आवश्यक चिकित्सकीय सावधानियों का पालन करते हुए पूरी की जाए.

 किशोरियों में गर्भधारण एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण स्थिति होती है. यह केवल एक चिकित्सकीय मुद्दा नहीं है. 15 साल की लड़की का शरीर पूरी तरह से विकसित हो सकता है, लेकिन इस उम्र में गर्भधारण से अक्सर एनीमिया खून की कमी उच्च रक्तचाप और प्री-एक्लेम्पसिया जैसी जटिलताए उत्पन्न हो जाती हैं. इसके अलावा, यह एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक बोझ भी डालता है.

 जोखिम क्या हैं?
इस फैसले के बाद लोग 31 हफ्तों में गर्भपात करने की जटिलता के संबंध में भी सवाल उठा रहे हैं। जहां सामान्य गर्भपात आमतौर पर 20–24 हफ्तें तक किए जाते हैं, वहीं 31 हफ्तों में गर्भ को समाप्त करना एक नियमित गर्भपात प्रक्रिया नहीं रह जाती।

इस उन्नत चरण में यह प्रक्रिया काफी हद तक एक सामान्य डिलीवरी जैसी ही होती है. डॉक्टर दवाओं का उपयोग करके लेबर शुरू करवाते हैं. चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि AIIMS जैसे बड़े अस्पतालों में, अनुभवी चिकित्सा दल यह सुनिश्चित करने के लिए हर सावधानी बरतते हैं कि युवा मरीज को किसी भी अनावश्यक जोखिम का सामना न करना पड़े. 31 हफ्तों तक भ्रूण काफी हद तक विकसित हो चुका होता है.

इस स्टेज पर कुछ मामलों में बच्चा जिंदा भी पैदा हो सकता है, बशर्ते उसे NICU में सही देखभाल मिले. इसलिए, यह फैसला सिर्फ मेडिकल नहीं है, बल्कि नैतिक तौर पर भी बहुत पेचीदा है. इस खास मामले में कोर्ट ने लड़की की मानसिक और शारीरिक भलाई को सबसे ज्यादा अहमियत दी.

क्या कानून बदलेगा?
क्या इस फैसले के बाद कानून में कोई बदलाव आएगा? इसका जवाब यह है कि 24 हफ्ते के बाद यह प्रक्रिया सिर्फ कोर्ट की मंजूरी से और सिर्फ गंभीर आधारों पर ही की जा सकती है. यह फैसला हर मामले पर लागू नहीं होगा। हर अलग मामले में मेडिकल रिपोर्ट लड़की की खास हालत और उससे जुड़े जोखिमों का मूल्यांकन हर मामले के आधार पर किया जाएगा.

 

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