बीजेपी के गढ़ बांकीपुर में सम्राट चौधरी की अग्निपरीक्षा, पीके की एंट्री से दिलचस्प हुआ मुकाबला
बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव राज्य की राजनीति का केंद्र बन गया है. मुख्यमंत्री बनने के बाद सम्राट चौधरी के नेतृत्व में यह पहला चुनाव होगा. इसलिए इस उपचुनाव को सरकार के कामकाज और राजनीतिक स्वीकार्यता की कसौटी के रूप में भी देखा जा रहा है.

पटना: बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव राज्य की राजनीति का केंद्र बन गया है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद यह सीट खाली हुई है. 30 जुलाई को होने वाले इस चुनाव को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली नई सरकार की पहली राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है. वहीं, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने चुनाव लड़ने का ऐलान कर मुकाबले को और रोचक बना दिया है.
शुरू हो चुकी नामांकन प्रक्रिया
नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और उम्मीदवार 13 जुलाई तक अपने नामांकन दाखिल कर सकते हैं। भाजपा ने अभी तक अपना प्रत्याशी घोषित नहीं किया है, जबकि प्रशांत किशोर मैदान में उतर चुके हैं. दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) भी पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी में है.
क्यों अहम है बांकीपुर सीट
बांकीपुर सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रही है. 1995 से इस क्षेत्र में पार्टी का दबदबा कायम है. नितिन नवीन से पहले उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा लगातार चुनाव जीतते रहे. बाद में नितिन नवीन ने उपचुनाव सहित लगातार पांच बार जीत दर्ज की और पिछले चुनाव में 50 हजार से अधिक मतों के अंतर से विजय हासिल की थी.
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इस सीट का जातीय समीकरण भी काफी अहम है. यहां कायस्थ मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक मानी जाती है, जिन्हें भाजपा का पारंपरिक समर्थन प्राप्त रहा है. इसके अलावा वैश्य, ब्राह्मण और राजपूत मतदाता भी भाजपा के मजबूत आधार माने जाते हैं. वहीं, यादव और मुस्लिम मतदाताओं पर राजद की पकड़ मानी जाती है. ऐसे में प्रशांत किशोर की मौजूदगी पारंपरिक वोटों के समीकरण को किस हद तक प्रभावित करेगी, इस पर सभी की नजर है.
बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को उठाया मुद्दा
मुख्यमंत्री बनने के बाद सम्राट चौधरी के नेतृत्व में यह पहला चुनाव होगा. इसलिए इस उपचुनाव को सरकार के कामकाज और राजनीतिक स्वीकार्यता की कसौटी के रूप में भी देखा जा रहा है. भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ सीट बचाने की नहीं, बल्कि अपने पुराने जीत के अंतर को बनाए रखने की भी होगी.
उधर, प्रशांत किशोर इस चुनाव को बिहार की राजनीति में नए विकल्प की परीक्षा बता रहे हैं. उन्होंने बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और शिक्षा जैसे मुद्दों को चुनावी बहस का केंद्र बनाने की कोशिश की है. ऐसे में बांकीपुर उपचुनाव अब केवल एक सीट का मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि यह एनडीए सरकार, विपक्ष और जन सुराज तीनों की राजनीतिक ताकत का महत्वपूर्ण परीक्षण बन गया है.


