तड़पते मरीजों की आखिरी उम्मीद पूरी! SC ने इच्छामृत्यु पर दी हरी झंडी, जानें पूरा लीगल स्टेटस
भारत में इच्छामृत्यु का दरवाजा थोड़ा-सा खुला है, लेकिन सिर्फ निष्क्रिय रूप में. अगर कोई व्यक्ति लाइलाज बीमारी या स्थायी कोमा में फंसा हो, तो सुप्रीम कोर्ट ने लिविंग विल के जरिए सपोर्ट हटाने की अनुमति दे दी है. मगर देकर मौत देना आज भी पूरी तरह अवैध है.

जब कोई व्यक्ति लाइलाज बीमारी या असहनीय दर्द में तड़प रहा हो, तो परिवार और समाज दोनों ही यही प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर उन्हें जल्द मुक्ति प्रदान करे. इसी मानवीय भावना से इच्छामृत्यु का विचार उभरा है, जो भारत में दशकों से कानूनी और नैतिक बहस का केंद्र रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसलों के माध्यम से पैसिव यूथेनेशिया को कुछ सख्त शर्तों के साथ वैधता प्रदान की है. हाल ही में हरीश राणा के मामले में कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जहां 13 साल से कोमा में पड़े 32 वर्षीय व्यक्ति को जीवन-रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति मिल गई है. यह भारत में कोर्ट-आदेशित पैसिव यूथेनेशिया का पहला मामला माना जा रहा है.
यह फैसला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की भावुक बेंच द्वारा सुनाया गया, जिसमें मरीज की गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को महत्व दिया गया. कोर्ट ने 2018 के फैसले को और स्पष्ट करते हुए ऐसे मामलों में प्रक्रिया को मजबूत बनाया है.
इच्छामृत्यु का अर्थ और प्रकार
इच्छामृत्यु दो मुख्य प्रकार की होती है- सक्रिय और निष्क्रिय. सक्रिय इच्छामृत्यु में दवा देकर मौत दी जाती है, जो भारत में पूरी तरह गैरकानूनी है. निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन-रक्षक उपकरण हटाए जाते हैं, जिससे मरीज प्राकृतिक रूप से मौत की ओर बढ़ता है. भारत में केवल निष्क्रिय रूप कुछ विशेष परिस्थितियों में वैध है, जो मरीज की गरिमा और दर्द से मुक्ति पर आधारित है.
अरुणा शानबाग केस
कानूनी यात्रा की शुरुआत1973 में मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग पर क्रूर हमला हुआ, जिसके बाद वे 42 साल तक कोमा में रहीं. 2011 में उनकी दोस्त पिंकी विरानी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मंजूरी दी, लेकिन सख्त शर्तों के साथ. लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति मिली, पर कोर्ट की निगरानी अनिवार्य थी. यह भारत में इच्छामृत्यु की कानूनी नींव रखने वाला पहला बड़ा मोड़ था.
विधि आयोग की रिपोर्टें और सिफारिशें
2006 में विधि आयोग की 196वीं रिपोर्ट में इच्छामृत्यु पर विचार किया गया. 2012 में 241वीं रिपोर्ट में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए मजबूत सिफारिश की गई. रिपोर्ट में मरीज, परिवार और डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट नियम बनाने पर जोर दिया गया. इन रिपोर्टों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को मजबूत आधार प्रदान किया और बहस को नई दिशा दी.
2018 का ऐतिहासिक फैसला
मार्च 2018 में कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध ठहराया. कोर्ट ने 'लिविंग विल' को मान्यता दी, जिसमें व्यक्ति पहले से लिखित रूप में निर्देश दे सकता है कि गंभीर हालत में वेंटीलीटर हटाया जाए. दुरुपयोग रोकने के लिए मेडिकल बोर्ड और परिवार की सहमति सहित विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए गए.
पहली कोर्ट-आदेशित पैसिव यूथेनेशिया
32 वर्षीय हरीश राणा 2013 में चौथी मंजिल से गिरने के बाद गंभीर ब्रेन इंजरी से 13 साल से कोमा में हैं. उनके माता-पिता ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की मांग की. सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS की रिपोर्ट देखी, जिसमें ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बताई गई. कोर्ट ने माता-पिता से व्यक्तिगत बातचीत की और अंततः जीवन-रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति दी. यह फैसला पैसिव यूथेनेशिया के व्यावहारिक लागू होने का पहला उदाहरण है.


