नई दिल्ली: देश में ब्रिटिश काल की कुछ ऐसी निशानियां आज भी ढोई जा रहीं है, जिन्हें कब का खत्म कर दिया जाना चाहिए था। Two Finger Test उनमें से एक है। रेप पीड़ित महिलाओं के लिए पुलिस ऐसी चिकित्सकीय जांच दशकों से करवाती आई है। कई राज्यों में इस पर रोक लगी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में गाईडलाईन तय की हुई हैं। फिर भी कहीं-कहीं ऐसे मामले आज भी सामने आ जाते हैं। अब एक ताजा मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को कहा है कि सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में विवादित टू-फिंगर जांच Two-Finger Test को पूरी तरह प्रतिबंधित करे। यह अमानवीय है।
ब्रिटिश काल स चली आ रही टू-फिंगर टेस्ट को हिंदी में कौमार्य परीक्षण भी कहा जाता है। यह प्रक्रिया एक पुरानी और विवादास्पद चिकित्सकीय प्रक्रिया है, जिसमें डॉक्टर पीड़िता की योनि की दो उंगलियों से जांच कर यह अनुमान लगाने की कोशिश करते थे कि वह पहले से यौन संबंधों की आदी है या नहीं। इसके जरिए योनि की मांसपेशियों के ढीलेपन या हाइमन भंग की जांच करके यह पता लगाने का दावा किया जाता था कि महिला 'वर्जिन' है या नहीं। अंग्रेजों द्वारा विकसित न्यायिक जांच प्रक्रियाओं में इसे एक अहम जांच माना जाता था।
झारखंड हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनाक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ रेप पीड़िताओं के संरक्षण और पुनर्वास से जुड़ी स्वतः संज्ञान जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मामले में अदालत ने साफ किया कहा कि यौन हिंसा की शिकार महिलाओं को न्याय दिलाने के बजाय कई बार उन्हें सामाजिक उपहास और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है। ऐसे मामलों में पहले जीरो एफआईआर दर्जा हो, फिर उसे संबंधित थाने को भेजा जाए। ऐसा न करने पर उनके खिलाफ आपराधिक एवं विभागीय कार्रवाई होगी। मामलों में पीड़िता की मेडिकल जांच जल्दी होनी चाहिए। जांच और बयान दर्ज करने में देरी असहनीय है। अदालत ने इसके लिए निर्देश दिए हैं। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में विवादित ‘टू-फिंगर टेस्ट’ Two-Finger Test को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए। साथ ही इस बात के सख्त निर्देश दिए हैं कि यदि कोई डॉक्टर या पैरामेडिकल कर्मचारी इस परीक्षण को करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी और इसे पेशेवर कदाचार माना जाएगा। साथ ही अदालत ने अदालत ने सभी मीडिया (प्रिंट, इलेक्ट्रानिक, इंटरनेट मीडिया) को निर्देश दिया है कि वे दुष्कर्म पीड़िता के नाम या पहचान को किसी भी माध्यम के जरिए प्रसारित या प्रकाशित न करें।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही दिशा निर्देशों की एक लंबी लिस्ट दे रखी है। झारखंड हाईकोर्ट का फैसला भी उसी तर्ज पर है। साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि रेप पीड़िता पर किया जाने वाला ‘टू-फिंगर टेस्ट’ किसी भी महिला के मान सम्मान और निजता के खिलाफ है। फिर साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच ने भी ऐसा ही कहा था। उन्होंने तो एक कदम आगे बढ़कर टू फिंगर टेस्ट को मेडिकल कॉलेजों के सिलेबस से ही इसे बाहर निकाल फेंकने को कहा था।
समय समय पर टू फिंगर टेस्ट के खिलाफ तमाम अदालती फैसले यही साबित करते हैं कि न्याय व्यवस्था में महिलाओं के मान-सम्मान और निजता को लेकर काफी संवेदनशीलता है। देखा जाए तो रेप पीडित महिलाओं की जांच के लिए किया जाने वाला टू फिंगर टेस्ट की जांच का तरीका उसे फिर से प्रताड़ित करने जैसा है। जरूरत है तमाम सरकारे और मेडिकल बिरादरी समय के, अंग्रेजों के समय की इस गंदी, वाहियात प्रथा को हर जगह से निकाल फेंके, वरना न्याय की प्रक्रिया स्वयं पीड़िता के लिए एक और सजा बन जाएगी। First Updated : Wednesday, 10 June 2026