केतन अग्रवाल मर्डर केस: सिया गोयल और चेतन ने लाई डिटेक्टर टेस्ट के लिए दी अपनी मंजूरी

पुणे के रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल की हत्या की जांच में एक अहम मोड़ आया है। मुख्य आरोपी सिया गोयल पॉलीग्राफ टेस्ट कराने के लिए तैयार हो गई हैं।

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पुणे: पुणे के रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल मर्डर केस में बड़ा मोड़ आया है। मुख्य आरोपी सिया गोयल ने पॉलीग्राफ टेस्ट यानी लाई डिटेक्टर टेस्ट के लिए हामी भर दी है। इसके बाद पुलिस अब सिया और उनके कथित प्रेमी चेतन चौधरी दोनों का टेस्ट कराने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। सरकारी वकील ने भी पुष्टि की है कि प्रक्रिया चल रही है।  

आरोपी ने खुद दी सहमति   

सिया गोयल के वकील विपुल डुसिंग ने बताया कि 20 साल की सिया ने गुरुवार को लोनावाला ग्रामीण पुलिस को टेस्ट के लिए लिखित सहमति दी। भारतीय कानून में पॉलीग्राफ टेस्ट सिर्फ आरोपी की मर्जी से ही हो सकता है। पुलिस को उम्मीद है कि इस टेस्ट से केस से जुड़ी अहम कड़ियां मिलेंगी, क्योंकि अभी जांच ज्यादातर परिस्थितिजन्य और तकनीकी सबूतों पर टिकी है।  

18 जून को हुई थी केतन की हत्या   

पुलिस के मुताबिक, 26 साल के केतन अग्रवाल को 18 जून को लोहागढ़ किले में करीब 400 मीटर गहरी खाई में धक्का देकर मार दिया गया था। आरोप है कि सिया गोयल और 22 साल के चेतन चौधरी ने शादी टालने के लिए साजिश रची। सिया और केतन की सगाई फरवरी में हुई थी और नवंबर में शादी होनी थी। फिलहाल दोनों आरोपी 3 जुलाई तक पुलिस हिरासत में हैं।  

पुलिस क्यों चाहती है पॉलीग्राफ टेस्ट?   

इस केस में पुलिस के सामने कई मुश्किलें हैं। कोई चश्मदीद गवाह नहीं मिला है। न ही उस जगह का कोई CCTV फुटेज है जहां से केतन गिरे। पुलिस का दावा है कि आरोपियों ने वारदात से पहले और बाद में मोबाइल से कॉल रिकॉर्ड और डेटा तक डिलीट कर दिया। शादी को लेकर परिवार और आरोपियों के बयान भी अलग-अलग हैं। ऐसे में पॉलीग्राफ टेस्ट से बयानों की सच्चाई परखने और नई जानकारी मिलने की उम्मीद है।  

लाई डिटेक्टर टेस्ट से क्या पता चलेगा?   

पॉलीग्राफ टेस्ट का रिजल्ट कोर्ट में सीधा सबूत नहीं माना जाता, लेकिन जांच में मदद करता है। इसमें सवालों के जवाब देते वक्त सांस, दिल की धड़कन, ब्लड प्रेशर और स्किन की प्रतिक्रिया रिकॉर्ड की जाती है। जांचकर्ता देखते हैं कि झूठ बोलते वक्त शरीर की प्रतिक्रिया सामान्य से कितनी अलग है।  

कानून क्या कहता है?  

सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में 'सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य' केस में साफ कहा था कि पॉलीग्राफ, नार्को या ब्रेन-मैपिंग टेस्ट आरोपी की सहमति के बिना नहीं हो सकते। जबरदस्ती टेस्ट कराना अनुच्छेद 20(3) और अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।   First Updated : Thursday, 02 July 2026