बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को नवंबर में संभावित विधानसभा चुनावों से जोड़ने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भारत के चुनाव आयोग (ECI) से तीखे सवाल किए. कोर्ट ने ईसीआई की मंशा पर सवाल नहीं उठाया, लेकिन समय के चयन पर आपत्ति जताई. जस्टिस सुधांशु धूलिया और जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि चुनाव के इतने करीब इस प्रक्रिया को शुरू करना न्यायसंगत नहीं है.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ईसीआई द्वारा मतदाता सूची को शुद्ध करने की प्रक्रिया असंवैधानिक नहीं है, लेकिन इसे चुनावों से पहले क्यों जोड़ा गया, यह गंभीर प्रश्न है. जस्टिस धूलिया ने कहा, “अगर सूची को अंतिम रूप दे दिया गया, तो कोई भी मतदाता जिसे बाहर कर दिया गया है, वह चुनाव से पहले उसे चुनौती नहीं दे पाएगा. यह उसके मताधिकार का हनन होगा.”
एक अन्य बड़ी चिंता आधार कार्ड को सत्यापन दस्तावेज के रूप में न मानने को लेकर उठी. अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि जब आधार व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त पहचान दस्तावेज़ है, तो इसे मान्य दस्तावेज़ों की सूची से बाहर क्यों रखा गया है. अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “पूरा देश आधार को मान रहा है, लेकिन ईसीआई उसे स्वीकार नहीं करता.”
ईसीआई के वकील ने बताया कि यह प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार अनिवार्य है, जिसमें केवल भारतीय नागरिकों को ही मतदाता के रूप में पंजीकृत करने की बात कही गई है. उन्होंने यह भी कहा कि 2003 के बाद यह पहला ऐसा व्यापक संशोधन है, जिसे कंप्यूटरीकरण के बाद शुरू किया गया है.
कोर्ट ने माना कि मतदाता सूची को शुद्ध करना आवश्यक है, ताकि गैर-नागरिकों के नाम हटाए जा सकें. हालांकि, अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित न करे.
कांग्रेस, राजद, तृणमूल कांग्रेस, भाकपा और अन्य दलों ने इस प्रक्रिया को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया है. इनके वकीलों का तर्क है कि 7.9 करोड़ नागरिकों की पात्रता की दोबारा जांच चुनाव से पहले कराना उचित नहीं है. कपिल सिब्बल ने कहा, “ईसीआई कैसे तय कर सकता है कि कौन नागरिक है? यह अधिकार उसके पास नहीं होना चाहिए.”
First Updated : Thursday, 10 July 2025