चीन ने अपनी सैन्य क्षमताओं को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाते हुए ऐसा खतरनाक हथियार विकसित किया है, जो समुद्र की गहराइयों से आसमान पर हमला करने की क्षमता रखता है. यह तकनीक न केवल पारंपरिक युद्ध की अवधारणा को बदल सकती है, बल्कि इंडो-पैसिफिक और दक्षिण चीन सागर में चीन के प्रभुत्व को और मजबूत कर सकती है.
इस साउंड सेंसर सिस्टम ने समुद्र की गहराई में 1,000 मीटर नीचे रहते हुए, 5,000 मीटर ऊंचाई पर उड़ रहे एक फिक्स्ड-विंग प्लेन का पता लगाकर और उसे ट्रैक करके दुनिया को चौंका दिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक समुद्री युद्ध के भविष्य को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखती है.
चीन ने अपनी पनडुब्बियों को एक शक्तिशाली शिकारी में बदलने की योजना पर काम किया है. इस नई तकनीक के तहत, समुद्र की गहराई में तैनात साउंड सेंसर सिस्टम पनडुब्बियों को आसमान में उड़ रहे विमानों की स्थिति का पता लगाने में सक्षम बनाता है.
अब तक, किसी भी देश के पास ऐसी उन्नत तकनीक नहीं थी. अधिकांश ध्वनि तरंगें जो विमानों द्वारा उत्पन्न होती हैं, समुद्र की सतह से परावर्तित होकर वापस आकाश में चली जाती थीं. लेकिन चीन ने ऐसी ध्वनि तरंगों को पहचानने और उनका उपयोग करने का तरीका खोज लिया है.
चीनी साइंस एकेडमी के झांग बो और पेंग झाओहुई की रिसर्च टीम ने एक अनोखा सिद्धांत पेश किया. उनके अनुसार, विमानों द्वारा उत्सर्जित ध्वनि तरंगें समुद्र तल से टकराने के बाद वापस लौटती हैं और लंबी दूरी तक यात्रा कर सकती हैं. इन कमजोर संकेतों को पकड़ने और उनका उपयोग करने के लिए चीन ने एक उन्नत तकनीकी समाधान विकसित किया है.
इस तकनीक से चीनी सेना की गुप्त खुफिया क्षमताओं को मजबूती मिली है. यह सिस्टम पनडुब्बियों को आसमान में उड़ रहे विमानों की सटीक स्थिति का पता लगाने और पानी के भीतर से मिसाइल दागने की क्षमता प्रदान करता है.
चीन और कुछ अन्य समुद्री शक्तियां समुद्र तल आधारित सिस्टम का उपयोग करके कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों का पता लगाने में सफलता हासिल कर चुकी थीं. लेकिन समुद्र की गहराई से ऊंचाई पर मौजूद लक्ष्यों का पता लगाना अब तक एक चुनौती बना हुआ था. चीन ने दशकों की रिसर्च और विकास के बाद इस चुनौती को पार करते हुए एक ऐसा हथियार बनाया है, जो भविष्य में युद्धों का स्वरूप बदल सकता है.
इस तकनीकी सफलता ने चीन की ताकत को एक नई दिशा दी है. अमेरिका और अन्य समुद्री शक्तियों के लिए यह चिंता का विषय बन सकता है, क्योंकि यह तकनीक चीन को रणनीतिक बढ़त देती है. First Updated : Monday, 27 January 2025