59 साल बाद UAE का यू-टर्न! आखिर OPEC से दूरी क्यों?

खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच UAE का OPEC छोड़ने का फैसला कई बड़े सवाल खड़े कर रहा है. ईरान के हमले, पाकिस्तान की 'तटस्थता' और सऊदी अरब से बढ़ती दूरी इन सबके बीच यह कदम क्षेत्रीय समीकरणों में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: खाड़ी क्षेत्र की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. लगभग 59 साल तक सदस्य रहने के बाद संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने वैश्विक तेल संगठन OPEC से अलग होने का फैसला किया है. इस कदम को सिर्फ ऊर्जा नीति में बदलाव नहीं, बल्कि क्षेत्रीय ताकतों के बीच बढ़ते तनाव और बदलते गठबंधनों के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ बिगड़ते समीकरणों की पृष्ठभूमि में लिया गया है. खासकर ईरान से जुड़े हालिया घटनाक्रमों और पाकिस्तान के रुख ने UAE को कूटनीतिक रूप से असहज स्थिति में ला दिया, जिसके बाद उसने यह बड़ा रणनीतिक कदम उठाया.

UAE पर हमले और बढ़ती सुरक्षा चिंता

बताया जा रहा है कि इस पूरे विवाद की जड़ें अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव से जुड़ी हैं. अमेरिका और इजराइल के बीच संघर्ष के दौरान जब ईरान ने UAE पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, तब अबू धाबी को अपने क्षेत्रीय सहयोगियों से मजबूत समर्थन की उम्मीद थी.

अबू धाबीके रक्षा मंत्रालय के अनुसार, UAE की वायु रक्षा प्रणाली ने 8 अप्रैल तक ईरान के 537 बैलिस्टिक मिसाइलों, 26 क्रूज मिसाइलों और 2,256 ड्रोन को बीच में ही नष्ट कर दिया. इसके बावजूद सुरक्षा को लेकर चिंताएं बनी रहीं.

पाकिस्तान की 'तटस्थता' से नाराजगी

लंदन स्थित 'फाइनेंशियल टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, UAE चाहता था कि पाकिस्तान ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए. लेकिन पाकिस्तान ने इसके बजाय अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाने का विकल्प चुना, जिससे एकतरफा युद्धविराम हो गया.

पाकिस्तान के इस रुख से UAE ने खुद को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग और सैन्य रूप से कमजोर महसूस किया. विशेषज्ञों के अनुसार, यह 'तटस्थता' UAE को बिल्कुल स्वीकार नहीं हुई.

आर्थिक जवाब और सऊदी अरब की भूमिका

पाकिस्तान के रवैये से नाराज होकर UAE ने आर्थिक दबाव बनाते हुए 3.5 अरब डॉलर के कर्ज की तत्काल वापसी की मांग कर दी. जबकि यह रकम 2027 के अंत तक मांगी जानी थी. यह राशि पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के भंडार का लगभग पांचवां हिस्सा मानी जा रही है.

इस संकट के दौरान सऊदी अरब ने हस्तक्षेप करते हुए पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का कर्ज दिया और साथ ही 5 अरब डॉलर की अतिरिक्त क्रेडिट लाइन देने का वादा किया.

सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक नाटो-जैसा रक्षा समझौता भी हुआ था, जिसके तहत पाकिस्तान सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए अपने परमाणु हथियार और मिसाइल समर्थन उपलब्ध करा सकता है.

सऊदी अरब और UAE के बीच बढ़ती दूरी

एक समय के मजबूत सहयोगी रहे सऊदी अरब और UAE के रिश्तों में अब कई मुद्दों पर मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं.

यमन संघर्ष: 2015 में दोनों देशों ने मिलकर हूती विद्रोहियों के खिलाफ अभियान चलाया था, लेकिन अब सऊदी अरब राजनीतिक समाधान की ओर झुक रहा है, जबकि UAE दक्षिणी अलगाववादियों का समर्थन कर रहा है.

सूडान गृहयुद्ध (2023): यूएई पर 'रैपिड सपोर्ट फोर्सेज' (RSF) का समर्थन करने का आरोप है, जबकि सऊदी अरब मिस्र के साथ मिलकर सूडानी सशस्त्र बलों (SAF) का समर्थन कर रहा है.

तेल उत्पादन कोटा: OPEC में उत्पादन कोटा और कीमतों को लेकर भी दोनों देशों के बीच लंबे समय से असहमति रही है, जहां सऊदी अरब का दबदबा रहा है.

OPEC छोड़ने के मायने

करीब छह दशकों तक OPEC का हिस्सा रहने के बाद UAE का इससे बाहर निकलना वैश्विक ऊर्जा बाजार और भू-राजनीति पर असर डाल सकता है.

पूर्ण उत्पादन की आजादी: अब UAE बिना किसी कोटा प्रतिबंध के अपनी पूरी क्षमता से तेल उत्पादन कर सकेगा. OPEC के कुल उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी करीब 9% थी और वह प्रतिदिन लगभग 30 लाख बैरल तेल का उत्पादन करता रहा है.

सऊदी प्रभाव से दूरी: यह कदम संकेत देता है कि UAE अब क्षेत्रीय रणनीति में सऊदी अरब के प्रभाव से अलग होकर स्वतंत्र फैसले लेना चाहता है.

मंत्रियों के बयान

यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहैल मोहम्मद अल मजरूई ने इसे दीर्घकालिक बाजार के अनुकूल नीति बताया. वहीं, उद्योग मंत्री सुल्तान अल जाबेर ने इसे राष्ट्रीय हित और ऊर्जा स्थिरता के लिए लिया गया संप्रभु निर्णय बताया.

हालांकि, OPEC से अलग होने का मतलब सऊदी अरब से संबंध खत्म करना नहीं है. दोनों देश अब भी व्यापारिक साझेदार और GCC के सदस्य हैं, लेकिन यह कदम UAE की रणनीतिक स्वतंत्रता का बड़ा संकेत माना जा रहा है.

ताजा खबरें

ट्रेंडिंग वीडियो