नई दिल्ली: हिंद महासागर में स्थित अमेरिकी-ब्रिटिश सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया को निशाना बनाने की ईरान की कोशिश ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल बढ़ा दी है. यह हमला न सिर्फ दूरी के लिहाज से अहम माना जा रहा है, बल्कि इससे ईरान की बढ़ती सैन्य क्षमता और रणनीतिक इरादों का भी संकेत मिलता है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अपने तट से करीब 4,000 किलोमीटर दूर स्थित इस अड्डे पर मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला करने का प्रयास किया. हालांकि दोनों मिसाइलें लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकीं, लेकिन इस घटना ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के बीच गंभीर चिंता पैदा कर दी है.
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ईरान ने दो बैलिस्टिक मिसाइलों से इस हमले को अंजाम देने की कोशिश की. इनमें से एक मिसाइल बीच रास्ते में ही फेल हो गई, जबकि दूसरी को अमेरिकी नौसेना के विध्वंसक पोत ने एसएम-3 इंटरसेप्टर के जरिए रोकने का प्रयास किया.
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इंटरसेप्शन पूरी तरह सफल रहा या नहीं, लेकिन लक्ष्य को कोई नुकसान नहीं पहुंचा.
यह हमला मुख्य रूप से अपनी दूरी के कारण चर्चा में है. डिएगो गार्सिया ईरान से करीब 3,800 किलोमीटर दूर स्थित है, जो ईरान की पहले घोषित 2,000 किलोमीटर की सीमा से काफी ज्यादा है.
विश्लेषकों के अनुसार, इस हमले में खोर्रमशहर-4 मिसाइल का इस्तेमाल किया गया हो सकता है, जिसकी संभावित मारक क्षमता 4,000 किलोमीटर से अधिक मानी जाती है.
अगर इस क्षमता की पुष्टि होती है, तो इसका मतलब है कि ईरान सैद्धांतिक रूप से यूरोप के कई बड़े शहरों तक भी अपनी पहुंच बना सकता है. इससे नाटो देशों के लिए खतरे का दायरा और बढ़ जाता है.
यह मिसाइल तरल ईंधन से चलती है और एक टन से अधिक वजन का वारहेड ले जाने में सक्षम है. इसमें क्लस्टर बम तैनात करने की क्षमता भी बताई जाती है.
इसका डिजाइन उत्तर कोरियाई और सोवियत तकनीक से प्रेरित है और इसमें पैंतरेबाजी करने की क्षमता भी शामिल है, जिससे इसे रोकना और मुश्किल हो जाता है.
डिएगो गार्सिया अमेरिका और ब्रिटेन का एक बेहद अहम सैन्य अड्डा है. यह चागोस द्वीपसमूह में स्थित है और लंबे समय से रणनीतिक अभियानों का केंद्र रहा है.
यह अड्डा अफगानिस्तान और इराक जैसे अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है और यहां से एशिया, अफ्रीका और खाड़ी क्षेत्रों में तेजी से सैन्य तैनाती संभव होती है.
अब तक इस अड्डे की दूरी और अलग-थलग स्थिति को इसकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता था. लेकिन ईरान द्वारा इसे निशाना बनाने की कोशिश ने इस धारणा को चुनौती दी है.
इस हमले के दौरान एसएम-3 इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया गया, जो “हिट-टू-किल” तकनीक पर आधारित है. यह मिसाइल बिना विस्फोटक के सीधे टक्कर मारकर लक्ष्य को नष्ट करती है.
यह हमला ऐसे समय हुआ है जब ईरान और अमेरिका-इजराइल गठबंधन के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है. ईरान पहले ही खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा ठिकानों पर हमले तेज कर चुका है और विरोधियों को चेतावनी भी दे चुका है.
इस घटनाक्रम के बीच अमेरिका ने क्षेत्र में अतिरिक्त युद्धपोत और हजारों मरीन सैनिक तैनात कर दिए हैं. यह संकेत देता है कि तनाव जल्द खत्म होने की संभावना कम है. First Updated : Saturday, 21 March 2026