नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में शांति की नई कूटनीति के बीच पाकिस्तान मुश्किल में फंस गया है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा इस्लामाबाद अब खुद इधर कुआं उधर खाई वाली स्थिति में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिम और अरब देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की है, लेकिन पाकिस्तान ने फिलहाल इससे साफ दूरी बना ली है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने कहा कि इस्लामाबाद ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगा जो उसकी विदेश नीति और फलस्तीन पर रुख के खिलाफ हो।
समा टीवी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने दोहराया कि पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देता और अब्राहम समझौते में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने याद दिलाया कि पाकिस्तान के पासपोर्ट पर आज भी इजरायल यात्रा मान्य नहीं है।
आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान का रुख सालों से साफ है। जब तक 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरूशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फलस्तीनी राष्ट्र नहीं बनता, तब तक इजरायल से रिश्ते सामान्य नहीं होंगे। उन्होंने इजरायल पर भरोसे को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि ऐसे पक्ष के साथ स्थायी समझौता मुश्किल है जिसके रुख पर लगातार संदेह हो।
अब्राहम समझौते 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से हुए थे। यूएई, बहरीन, मोरक्को और सूडान ने इजरायल से रिश्ते सामान्य किए थे। ट्रंप प्रशासन अब ईरान के साथ संभावित समझौते को भी इसी ढांचे से जोड़ रहा है।
जानकार मानते हैं कि अगर पाकिस्तान खुलकर विरोध करता है तो अमेरिका से रिश्तों पर असर पड़ेगा। वहीं घरेलू राजनीति, धार्मिक समूहों और फलस्तीन समर्थक जनमत के कारण समर्थन करना भी आसान नहीं है।
गौरतलब है कि सऊदी अरब ने अब तक इजरायल से रिश्ते सामान्य करने को फलस्तीनी समाधान से जोड़ा है। अगर रियाद भविष्य में अब्राहम समझौते की तरफ बढ़ता है तो पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा। फिलहाल पाकिस्तान चीन के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने पर जोर दे रहा है।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की 23 से 26 मई की चीन यात्रा में दोनों देशों ने साझा भविष्य के निर्माण पर सहमति जताई। पाकिस्तान ने पश्चिम एशिया में शांति को लेकर राष्ट्रपति शी चिनफिंग के प्रस्तावों का समर्थन किया है। First Updated : Tuesday, 26 May 2026