मिडिल ईस्ट संकट से ग्लोबल मार्केट में मचा हड़कंप, तेल की कीमतों में आया भारी उछाल
मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव से वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल मच गई. तेल की कीमतों में तेज उछाल आया, शेयर बाजार गिरे और निवेशक डॉलर, सोना व बॉन्ड की ओर मुड़े. संघर्ष लंबा खिंचने की आशंका से महंगाई का खतरा बढ़ गया है.

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य टकराव का असर अब सीधे तौर पर तेल की कीमतों में दिखाई दे रहा है. सोमवार को वैश्विक बाजारों में तेज हलचल रही- तेल की कीमतें उछल गईं, शेयर बाजार टूटे और निवेशक सुरक्षित ठिकानों की ओर भागे. हालात ऐसे हैं कि अगर संघर्ष लंबा चला, तो महंगाई और आर्थिक दबाव दोनों बढ़ सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 7.5% चढ़कर 78.34 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया.
वहीं अमेरिकी कच्चा तेल 7.3% बढ़कर 71.88 डॉलर प्रति बैरल हो गया. सोने में भी तेजी दिखी और इसकी कीमत 1.5% बढ़कर 5,358 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई. निवेशकों ने अनिश्चित माहौल में सोने और डॉलर को ज्यादा सुरक्षित माना. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर जारी हमलों में फिलहाल कमी के संकेत नहीं हैं. जवाब में ईरान ने भी मिसाइल हमले किए हैं, जिससे यह आशंका बढ़ गई है कि संघर्ष और देशों को अपनी चपेट में ले सकता है.
ट्रंप का संकेत: लंबा चल सकता है संघर्ष
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संकेत दिया है कि यह टकराव चार हफ्तों तक जारी रह सकता है. उन्होंने कहा कि जब तक अमेरिका के उद्देश्य पूरे नहीं होते, तब तक सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी. इस बयान ने बाजार की चिंता और बढ़ा दी है.
होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी नजरें
दुनिया का ध्यान इस समय होर्मुज जलडमरूमध्य पर है. यहां से वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20% गुजरता है. फिलहाल रास्ता बंद नहीं हुआ है, लेकिन टैंकरों की आवाजाही धीमी पड़ गई है. कई जहाज बीमा और सुरक्षा कारणों से आगे बढ़ने में हिचक रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यहां से आपूर्ति बाधित होती है, तो रोजाना करीब 1.5 करोड़ बैरल तेल बाजार तक नहीं पहुंच पाएगा. इससे कीमतों में और तेज उछाल आ सकता है.
तेल उत्पादक देशों के समूह OPEC ने अप्रैल के लिए उत्पादन में मामूली बढ़ोतरी की घोषणा की है. लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा तनाव को देखते हुए यह बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं होगी. कुछ विशेषज्ञों ने इसकी तुलना 1970 के दशक के मध्य पूर्व तेल प्रतिबंध से की है, जब तेल की कीमतें कई गुना बढ़ गई थीं. उनका कहना है कि मौजूदा हालात में कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर भी जा सकती हैं.
एशियाई और अमेरिकी बाजारों में गिरावट
तेल महंगा होने का असर एशिया में साफ दिखा. जापान, जो अपना लगभग पूरा तेल आयात करता है, वहां निक्केई सूचकांक 2.3% गिर गया. दक्षिण कोरिया में भी बाजार 1% नीचे आया. एशिया-प्रशांत क्षेत्र का व्यापक सूचकांक 0.6% गिरा. यूरोप में EUROSTOXX 50 और DAX फ्यूचर्स में करीब 2% की गिरावट रही. अमेरिका में S&P 500 और NASDAQ फ्यूचर्स में भी 1% से अधिक की कमजोरी दर्ज की गई.
डॉलर और बॉन्ड में मजबूती
मुद्रा बाजार में डॉलर मजबूत हुआ. यूरो 0.4% गिर गया, जबकि डॉलर के मुकाबले येन भी कमजोर पड़ा. 10-वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड घटकर 3.926% पर आ गई, जो तीन महीने का निचला स्तर है. निवेशक अस्थिर माहौल में बॉन्ड को सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं.


