क्या आने वाला है नया तेल संकट? होर्मुज पर तनाव से 120 डॉलर के करीब पहुंचा कच्चा तेल
होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित व्यवधान के खतरे से वैश्विक तेल बाजार में चिंता बढ़ गई है और ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर के करीब पहुंच गया है. इस मार्ग से दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति गुजरती है, जिससे खासकर एशियाई अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं.

नई दिल्ली: कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ते हुए 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं. इस अचानक उछाल ने विशेषज्ञों और कारोबारियों को चिंतित कर दिया है, क्योंकि इसे 1970 के दशक के बड़े तेल संकटों से जोड़कर देखा जा रहा है. इस चिंता की मुख्य वजह मध्य पूर्व में स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बेहद महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है. होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्गों में से एक है.
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार, इस संकरे समुद्री रास्ते से हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते हैं. यह मात्रा वैश्विक तेल खपत का लगभग 20 प्रतिशत और समुद्री तेल व्यापार के एक चौथाई से भी ज्यादा है. यानी दुनिया के हर पांच में से एक बैरल तेल इसी मार्ग से होकर गुजरता है. इसलिए अगर यहां किसी भी तरह का व्यवधान आता है तो उसका असर सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ता है.
एशियाई देशों पर पड़ सकता है सबसे ज्यादा असर
होर्मुज से गुजरने वाले तेल का बड़ा हिस्सा एशियाई देशों तक पहुंचता है. चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े आयातक देश इस मार्ग पर काफी हद तक निर्भर हैं. अनुमान है कि इस रास्ते से गुजरने वाले कुल कच्चे तेल का आधे से ज्यादा हिस्सा इन चार देशों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है. ऐसी स्थिति में अगर यहां लंबे समय तक रुकावट आती है तो इसका सबसे पहला और बड़ा असर एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर देखने को मिल सकता है.
तेल आपूर्ति संकट का खतरा
बाजार से जुड़ी एक रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद हो जाता है तो इतिहास का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति संकट पैदा हो सकता है. अनुमान के अनुसार इससे रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.
अगर इसे पिछले संकटों से तुलना करें तो यह काफी बड़ा झटका हो सकता है. उदाहरण के तौर पर 1973 के योम किप्पुर युद्ध के दौरान लगाए गए तेल प्रतिबंध से वैश्विक बाजार में प्रतिदिन लगभग 4 से 5.5 मिलियन बैरल तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई थी. इसी तरह 1978-79 की ईरानी क्रांति और 1980 में शुरू हुए ईरान-इराक युद्ध के समय भी तेल आपूर्ति में बड़ी गिरावट देखी गई थी. लेकिन संभावित रूप से होर्मुज की पूर्ण नाकाबंदी इन सभी घटनाओं से कहीं ज्यादा बड़ा असर डाल सकती है.
क्या पूरी तरह रुक सकती है आपूर्ति?
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि 2 करोड़ बैरल प्रतिदिन की आपूर्ति का रुकना सबसे खराब स्थिति का अनुमान है. वास्तव में पूरी तरह से तेल का प्रवाह रुक जाना आसान नहीं है. कुछ टैंकरों का आवागमन जारी रह सकता है. इसके अलावा सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों के पास ऐसे पाइपलाइन मार्ग भी हैं जिनके जरिए तेल को जलडमरूमध्य को पार किए बिना दूसरे बंदरगाहों तक पहुंचाया जा सकता है. साथ ही कई देशों के पास रणनीतिक तेल भंडार भी मौजूद हैं, जिनका उपयोग आपात स्थिति में किया जा सकता है.
भारत के लिए क्यों चिंता की बात
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति खास तौर पर चुनौतीपूर्ण हो सकती है. भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. इसलिए वैश्विक बाजार में कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है. भारतीय रिजर्व बैंक के अध्ययन के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत की वृद्धि से महंगाई बढ़ सकती है और आर्थिक वृद्धि पर भी असर पड़ सकता है.
कीमतों में तेजी का असर
अगर तेल की कीमतों में यह बढ़ोतरी थोड़े समय के लिए है तो स्थिति संभाली जा सकती है. लेकिन यदि कीमतें लगातार 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ती रहती हैं, तो इसका असर महंगाई, सरकारी खर्च और वित्तीय बाजारों पर भी पड़ सकता है. असल समस्या यह है कि दुनिया की तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा एक बेहद संकरे समुद्री मार्ग पर निर्भर है. अगर यह रास्ता लंबे समय के लिए बाधित हो जाता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार को गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है.


