ईरान-अमेरिका तनाव के बीच पाकिस्तान की 'मध्यस्थ' भूमिका, सऊदी अरब क्यों हुआ असहज?

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच पाकिस्तान खुद को शांति मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन उसकी यह भूमिका सऊदी अरब के लिए असहजता का कारण बन रही है. क्षेत्रीय समीकरणों के बीच यह कूटनीतिक कदम कई चुनौतियां भी खड़ी कर रहा है.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में जारी ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच पाकिस्तान खुद को एक अहम शांति मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. बढ़ते युद्ध और ऊर्जा संकट के खतरे के बीच इस्लामाबाद की कूटनीतिक सक्रियता ने वैश्विक स्तर पर नई चर्चा को जन्म दिया है.

हालांकि, पाकिस्तान की यह भूमिका सभी के लिए सहज नहीं है. खासकर सऊदी अरब के साथ उसके रक्षा समझौते और क्षेत्रीय समीकरणों के चलते यह प्रयास उसके लिए चुनौतीपूर्ण भी बनता जा रहा है.

कूटनीतिक हलचल तेज, ट्रंप और ईरान से संपर्क

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशें तब तेज हुईं जब सेना प्रमुख असीम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सीधे बातचीत की.

इसके बाद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से संपर्क साधा और इस्लामाबाद को संभावित युद्धविराम वार्ता के स्थान के रूप में प्रस्तावित किया.

15 सूत्रीय शांति योजना भी ठुकराई

खबरों के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका की 15 सूत्रीय शांति योजना ईरान तक पहुंचाई, लेकिन तेहरान ने इसे स्वीकार नहीं किया. पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र लंबे समय से इस गुप्त कूटनीति में सक्रिय हैं, लेकिन हालिया तनाव ने इन प्रयासों को और तेज कर दिया है.

पाकिस्तान के लिए क्यों मुश्किल है राह?

यदि ईरान समझौते के लिए तैयार नहीं होता, तो पाकिस्तान की स्थिति जटिल हो सकती है. खासतौर पर सऊदी अरब के साथ उसके रक्षा समझौते के कारण, कोई भी बड़ा तनाव उसे सीधे इस संघर्ष में खींच सकता है.

मध्यस्थता से बढ़ सकता है वैश्विक कद

अगर पाकिस्तान वाशिंगटन और तेहरान को एक मंच पर लाने में सफल होता है, तो यह उसकी वैश्विक साख को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है. इसे 1972 में अमेरिका-चीन के बीच गुप्त कूटनीति में निभाई गई भूमिका के समान माना जा रहा है.

आंतरिक और बाहरी दबाव

पाकिस्तान, जो एक ओर अमेरिका और दूसरी ओर ईरान से संपर्क बनाए हुए है, इस संघर्ष के खत्म होने से सीधे लाभान्वित हो सकता है. लेकिन देश के भीतर भी चुनौतियां हैं.

ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिससे आंतरिक दबाव भी बढ़ा.

विशेषज्ञों की राय

क्विंसी इंस्टीट्यूट के एडम वेनस्टीन ने कहा,"पाकिस्तान के पास एक मध्यस्थ के रूप में असाधारण विश्वसनीयता है, क्योंकि वह वाशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए रखता है, जबकि दोनों के साथ तनावपूर्ण संबंधों का इतिहास इसे एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में देखे जाने के लिए पर्याप्त दूरी प्रदान करता है."

अमेरिका और ईरान के साथ जटिल रिश्ते

पिछले एक साल में पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने ट्रंप के साथ संबंध मजबूत किए हैं. दावोस में मुलाकात के बाद कूटनीतिक रिश्तों में नई गति आई है.

रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच कई संदेशों के आदान-प्रदान में भी भूमिका निभाई है.

सऊदी अरब के साथ समझौता बना चुनौती

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा समझौता इस स्थिति को और संवेदनशील बनाता है. यदि ईरान खाड़ी देशों पर हमले जारी रखता है, तो इस्लामाबाद के लिए संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है.

विदेश मंत्री इसहाक डार ने भी कहा कि पाकिस्तान इस समझौते से बंधा हुआ है, लेकिन वह कूटनीतिक प्रयासों के जरिए संघर्ष से दूर रहने की कोशिश कर रहा है.

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