'ईरान नहीं झुका', अमेरिका संग संभावित समझौते को तेहरान बता रहा अपनी बड़ी जीत

अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की चर्चाओं के बीच तेहरान इसे अपनी रणनीतिक जीत के रूप में पेश कर रहा है. ईरान का दावा है कि उसने भारी दबाव के बावजूद अमेरिका और इजरायल के सामने झुकने के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाने पर मजबूर किया.

Sachin Hari Legha

नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर जारी चर्चाओं के बीच तेहरान इसे अपनी रणनीतिक और राजनीतिक सफलता के रूप में पेश करने में जुट गया है. ईरानी नेतृत्व और सरकारी मीडिया लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि भारी सैन्य और आर्थिक दबाव के बावजूद ईरान ने अमेरिका और इजरायल के सामने झुकने के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाने पर मजबूर किया.

ईरान का दावा है कि उसने वैश्विक दबाव के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया, बल्कि अपनी शर्तों और रणनीति के साथ बातचीत को आगे बढ़ाया. ऐसे समय में जब अमेरिका और इजरायल लगातार ईरान पर दबाव बना रहे थे, तेहरान अब संभावित समझौते को अपनी कूटनीतिक ताकत के तौर पर दिखा रहा है.

इस्माइल बघाई का बड़ा बयान

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्राचीन फारसी साम्राज्य से जुड़ी एक ऐतिहासिक तस्वीर का उल्लेख करते हुए बड़ा बयान दिया. उन्होंने लिखा कि जिस तरह कभी रोमन साम्राज्य की अजेयता का भ्रम टूटा था, उसी तरह आज ईरान ने भी ताकतवर देशों के सामने झुकने से इनकार किया है.

उनके इस बयान को मौजूदा अमेरिका-ईरान वार्ता और संभावित समझौते से जोड़कर देखा जा रहा है.

समझौते में किसे होगा फायदा?

विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते का अंतिम स्वरूप सामने आने से पहले यह तय करना आसान नहीं होगा कि वास्तविक लाभ किसे मिलेगा. हालांकि, ईरान के पास इसे घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय प्रभाव के स्तर पर बड़ी जीत के रूप में पेश करने का पर्याप्त अवसर मौजूद है.

विश्लेषकों के अनुसार, तेहरान अपने नागरिकों और सहयोगी देशों के बीच यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि उसने दबाव की राजनीति के सामने झुकने के बजाय अपनी शर्तों पर बातचीत की राह चुनी.

बिना शर्त आत्मसमर्पण से बातचीत तक

यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की विश्लेषक एली गेरानमायेह के मुताबिक, दो महीने पहले तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 'बिना शर्त आत्मसमर्पण' की बात कर रहे थे, लेकिन अब अमेरिका को बातचीत के जरिए समाधान तलाशना पड़ रहा है.

उनके अनुसार, ईरान ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह दो परमाणु शक्तियों - अमेरिका और इजरायल के दबाव का सामना करने में सक्षम है.

होर्मुज जलडमरूमध्य बना ताकत का संकेत

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कई विश्लेषकों का मानना है कि ईरान खुद को मजबूत स्थिति में इसलिए भी देख रहा है क्योंकि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करने की क्षमता का प्रदर्शन किया.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिका और इजरायल अपने कई बड़े रणनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं कर सके. ईरान के शीर्ष सैन्य नेताओं और सर्वोच्च नेता को निशाना बनाए जाने के बावजूद वहां की सत्ता व्यवस्था कायम रही.

इसके अलावा, संभावित समझौते में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम या उसके सहयोगी सशस्त्र गुटों पर किसी बड़ी शर्त का फिलहाल उल्लेख सामने नहीं आया है.

आर्थिक संकट के बीच राहत की उम्मीद

हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ईरान की स्थिति पूरी तरह मजबूत नहीं है. युद्ध और प्रतिबंधों की वजह से देश गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है. स्टील, पेट्रोकेमिकल और कई अहम उद्योगों को भारी नुकसान हुआ है.

ऐसे में यदि संभावित समझौते के तहत ईरान को तेल निर्यात में राहत मिलती है या विदेशों में जमे आर्थिक फंड तक पहुंच हासिल होती है, तो तेहरान इसे घरेलू स्तर पर बड़ी राजनीतिक और आर्थिक सफलता के रूप में पेश कर सकता है.

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