होर्मुज जलडमरूमध्य पर सैन्य कार्रवाई का प्रस्ताव अटका, रूस-चीन-फ्रांस ने UNSC में लगाया वीटो
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर लाया गया प्रस्ताव रूस, चीन और फ्रांस के वीटो के कारण अटक गया. सैन्य कार्रवाई की मांग वाले इस प्रस्ताव ने मिडिल ईस्ट की राजनीति को और गरमा दिया है.

नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में एक अहम प्रस्ताव को बड़ा झटका लगा है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस, चीन और फ्रांस ने उस प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने के लिए सैन्य कार्रवाई की अनुमति मांगी गई थी.
इस प्रस्ताव को बहरीन और अन्य खाड़ी देशों का समर्थन प्राप्त था, लेकिन वीटो पावर रखने वाले देशों के विरोध के चलते इसे फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है. इस घटनाक्रम ने वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
बहरीन के प्रस्ताव को नहीं मिली मंजूरी
अधिकारियों के मुताबिक, यह प्रस्ताव बहरीन ने अपने खाड़ी सहयोगियों के साथ मिलकर तैयार किया था. इसमें सदस्य देशों और बहुराष्ट्रीय नौसैनिक बलों को “सभी आवश्यक साधनों” के इस्तेमाल की अनुमति देने की मांग की गई थी, ताकि समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखा जा सके.
हालांकि, रूस, चीन और फ्रांस ने साफ कर दिया कि वे सैन्य बल के उपयोग की अनुमति देने वाले किसी भी प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हैं.
UNSC में मतभेद, वोटिंग पर नजर
इस प्रस्ताव पर शुक्रवार को मतदान होने की संभावना जताई जा रही है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर सहमति बनना मुश्किल दिख रहा है.
बताया जा रहा है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के साथ-साथ 10 अस्थायी सदस्य देशों के बीच भी इस मुद्दे पर मतभेद बने हुए हैं.
मैक्रॉन ने सैन्य विकल्प को बताया 'अवास्तविक'
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने सैन्य कार्रवाई के विचार को खारिज करते हुए इसे “अवास्तविक” करार दिया. उनका मानना है कि इससे ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और बैलिस्टिक मिसाइलों का खतरा और बढ़ सकता है.
प्रस्ताव में क्या था खास
कई हफ्तों की चर्चा के बाद प्रस्ताव में सीमित संशोधन किए गए. इसमें कहा गया था कि सदस्य देश राष्ट्रीय या बहुराष्ट्रीय नौसैनिक सहयोग के जरिए “सभी आवश्यक साधनों” का उपयोग कर सकते हैं, बशर्ते इसकी जानकारी पहले सुरक्षा परिषद को दी जाए.
इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और होर्मुज के जरिए होने वाले नौवहन को बाधित होने से बचाना था.
होर्मुज जलडमरूमध्य का रणनीतिक महत्व
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम है. 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के साथ युद्ध के बाद ईरान ने इस मार्ग को बंद कर दिया था.
यहां से दुनिया का करीब 20% तेल और गैस गुजरता है, और इसके बंद होने से वैश्विक बाजार में अस्थिरता, तेल की कीमतों में वृद्धि और शिपिंग लागत में इजाफा हुआ है.
ऊर्जा बाजार पर गहरा असर
इस नाकेबंदी का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिख रहा है. कतर जैसे देशों को अपना उत्पादन रोकना पड़ा, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा.
साथ ही, ईरान ने खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों और अन्य बुनियादी ढांचे को निशाना बनाते हुए जवाबी हमले भी किए हैं, जिनमें कई लोगों की जान गई.
ईरान पर बहरीन का आरोप
बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल्लतीफ बिन राशिद अल ज़यानी ने सुरक्षा परिषद में ईरान पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि ईरान की कार्रवाई "धोखेबाजी" और "पूर्व नियोजित" थी, जो अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है.
उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान ने हवाई अड्डों, जल संयंत्रों, बंदरगाहों और होटलों जैसी नागरिक संरचनाओं को निशाना बनाया.
बदलते समीकरण और मध्यस्थता की नई भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संघर्ष ने ईरान और उसके पड़ोसी देशों के बीच सुधरते संबंधों को फिर से बिगाड़ दिया है.
अब क्षेत्रीय मध्यस्थता की भूमिका ओमान और कतर के बजाय पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देशों के पास जाती दिख रही है.
युद्धविराम पर भी शर्तें
गल्फ रिसर्च सेंटर के अध्यक्ष अब्दुलअजीज सागर ने कहा कि किसी भी युद्धविराम समझौते में ईरान की सैन्य क्षमताओं और होर्मुज पर नियंत्रण के मुद्दे को शामिल करना जरूरी होगा.
उन्होंने कहा, "उन्होंने हमारे साथ जो किया, हम उसे नहीं भूलेंगे."


