FAFO Parenting Trend: क्या है यह नया पेरेंटिंग तरीका? बच्चों को बनाता है आत्मनिर्भर या बढ़ाता है जोखिम
आजकल पेरेंट्स अपने बच्चों को बेहतर ढंग से समझने और उनकी देखभाल करने के लिए नए पेरेंटिंग स्टाइल अपना रहे हैं. ऐसा ही एक तरीका है FAFO पेरेंटिंग, जो आजकल बहुत ज़्यादा चर्चा में है. आइए समझते हैं कि FAFO पेरेंटिंग क्या है और यह बच्चों पर कैसे असर डालती है.

नई दिल्ली: बदलते समय के साथ बच्चों की परवरिश के तरीके भी तेजी से बदल रहे हैं. आज के दौर में माता-पिता नए-नए पेरेंटिंग स्टाइल अपना रहे हैं, ताकि बच्चों को बेहतर तरीके से समझा और संभाला जा सके. इन्हीं में से एक है FAFO पेरेंटिंग, जो इन दिनों काफी चर्चा में है.
कहा जा रहा है कि यह पेरेंटिंग स्टाइल बच्चों को आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बनाता है, लेकिन इसके साथ ही इसके कुछ जोखिम भी जुड़े हुए हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि FAFO पेरेंटिंग क्या है और इसे अपनाने से बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है.
क्या है FAFO पेरेंटिंग?
FAFO पेरेंटिंग का मतलब है कि बच्चा अपनी गलती से खुद सीखे और उसके परिणाम को भी समझे. यह कोई नया तरीका नहीं है, बल्कि पुराने सिद्धांत को नए नाम के साथ पेश किया गया है.
इस पेरेंटिंग स्टाइल में माता-पिता बच्चों को हर छोटी बात पर रोकने-टोकने के बजाय उन्हें खुद अनुभव करने देते हैं. जैसे अगर बच्चा खाना नहीं खाता है, तो उसे तुरंत दूसरा विकल्प नहीं दिया जाता. जब उसे भूख लगेगी, तब ही उसे खाना मिलेगा.
इसी तरह अगर बच्चा कोई चीज तोड़ देता है, तो उसे तुरंत नया खिलौना नहीं दिया जाता, जिससे उसे चीजों की अहमियत समझ आती है.
FAFO पेरेंटिंग के फायदे
- इस पेरेंटिंग स्टाइल के कुछ सकारात्मक प्रभाव बच्चों के व्यवहार में देखने को मिल सकते हैं.
- बच्चे खुद सोच-समझकर फैसले लेना सीखते हैं, जिससे उनकी निर्णय क्षमता मजबूत होती है.
- बच्चा अपनी गलतियों से सीखता है, जिससे भविष्य में वही गलती दोहराने की संभावना कम होती है.
- माता-पिता को हर समय बच्चे पर नजर रखने की जरूरत कम हो जाती है, क्योंकि बच्चा खुद समझने लगता है कि गलती का परिणाम क्या होगा.
इसके नुकसान भी हैं
जहां इसके फायदे हैं, वहीं कुछ नुकसान भी सामने आते हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
- अगर बच्चे को पूरी तरह खुला छोड़ दिया जाए, तो वह खुद को अकेला महसूस कर सकता है और उसे लग सकता है कि माता-पिता उसका ध्यान नहीं रखते.
- बच्चे जोखिम भरे काम कर सकते हैं, जैसे दवाई खा लेना, साइकिल चलाते समय गिरना या किचन में खतरे वाली चीजों के संपर्क में आना.
किन बच्चों के लिए सही है यह तरीका?
यह पेरेंटिंग स्टाइल आमतौर पर 5-6 साल के बच्चों के लिए ज्यादा प्रभावी माना जाता है.
छोटे बच्चे, खासकर 3-4 साल के, अभी उतनी समझ नहीं रखते, इसलिए उनके लिए यह तरीका नुकसानदायक हो सकता है.
क्या ध्यान रखना जरूरी है?
अगर माता-पिता इस पेरेंटिंग स्टाइल को अपनाते हैं, तो उन्हें कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए. बच्चे की गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी है और जहां जरूरत हो, वहां समझाना या डांटना भी जरूरी है.
जैसे समय पर होमवर्क करना, मोबाइल से दूरी बनाए रखना जैसी आदतें बच्चों को सिखाना जरूरी है. प्यार और समझदारी के साथ बच्चे को सही दिशा दी जा सकती है.


