Baisakhi 2026: आज मनाई जा रही बैसाखी, जानें शुभ मुहूर्त और इस पर्व का धार्मिक महत्व

आज पूरे देश में बैसाखी का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है. यह दिन जहां किसानों के लिए फसल कटाई की खुशी लेकर आता है, वहीं धार्मिक रूप से भी बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि इसी दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

बैसाखी 2026: उत्तर भारत में आज बैसाखी का पर्व पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है. यह त्योहार खासतौर पर किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इसी समय रबी की फसल, विशेषकर गेहूं की कटाई पूरी होती है. अपनी मेहनत की फसल घर आने की खुशी में किसान इस दिन प्रकृति और ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करते हैं.

धार्मिक दृष्टि से भी बैसाखी का दिन बेहद खास माना जाता है. इस दिन सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे एक शुभ परिवर्तन के रूप में देखा जाता है. यही कारण है कि इस पर्व को वैशाख संक्रांति और मेष संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है.

बैसाखी का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य देव को ग्रहों का राजा माना गया है. जब सूर्य अपनी राशि बदलते हैं, तो इसका प्रभाव सभी राशियों और पृथ्वी पर पड़ता है.

इस दिन लोग सूर्य देव की पूजा-अर्चना करते हैं और जीवन में सुख, समृद्धि, ऊर्जा और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हैं. यह पर्व आस्था और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक भी माना जाता है.

कब है बैसाखी 2026?

हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के बाद वैशाख माह की शुरुआत होती है और इसी महीने के पहले दिन बैसाखी मनाई जाती है.

साल 2026 में बैसाखी का पर्व मंगलवार, 14 अप्रैल को मनाया जा रहा है. इस दिन सूर्य देव सुबह करीब 9 बजकर 31 मिनट पर मेष राशि में प्रवेश करेंगे.

बैसाखी 2026: पूजा का शुभ मुहूर्त

14 अप्रैल को पुण्यकाल सुबह 5 बजकर 56 मिनट से लेकर दोपहर 3 बजकर 55 मिनट तक रहेगा. इस अवधि में स्नान, दान और पूजा को विशेष रूप से फलदायी माना गया है.

उत्तराखंड में इस पर्व को 'बिखोती' के नाम से मनाया जाता है, जो 14 और 15 अप्रैल को आयोजित होता है. इस दौरान लाटू देव की विशेष पूजा की जाती है. भक्तजन देवताओं को अनाज से बने प्रसाद अर्पित करते हैं और मंदिरों के बाहर सांस्कृतिक मेलों का आयोजन भी किया जाता है.

बैसाखी का इतिहास

बैसाखी को सिख समुदाय के नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है. मान्यता है कि वर्ष 1699 में इस दिन सिखों के दसवें और अंतिम गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी.

इस वजह से पंजाब और हरियाणा सहित कई क्षेत्रों में यह पर्व बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. सिख श्रद्धालु गुरुद्वारों में जाकर अरदास करते हैं और गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनते हैं.

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