महाभारत सिर्फ युद्ध की नहीं, बल्कि रिश्तों, धर्म और कर्तव्य की भी महागाथा है. इसमें कई पात्र ऐसे हैं जो भले ही केंद्र में न हों, लेकिन जिनका योगदान इतिहास में अमिट छाप छोड़ गया. ऐसा ही एक पात्र था युयुत्सु — वह योद्धा जिसे कौरवों ने कभी स्वीकार नहीं किया, लेकिन युद्ध के बाद उन्हीं का अंतिम संस्कार करने की जिम्मेदारी उसी ने निभाई.
कौरवों के सौतेले भाई युयुत्सु ने जहां धर्म और नीति के लिए पांडवों का साथ दिया, वहीं युद्ध के अंत में कौरवों के शवों का दाह-संस्कार कर एक ऐसे धर्म का पालन किया जो उस समय किसी और ने नहीं किया. आइए जानते हैं युयुत्सु की अनसुनी लेकिन अद्भुत कहानी.
युयुत्सु धृतराष्ट्र का पुत्र था, लेकिन गांधारी की संतान नहीं था. उसका जन्म धृतराष्ट्र की दासी से हुआ था, जो गांधारी के गर्भवती होने के समय उनके देखभाल के लिए नियुक्त की गई थी. जब गांधारी के 100 पुत्रों ने जन्म लिया, तभी वह दासी भी एक पुत्र को जन्म देती है..यही था युयुत्सु. कौरवों के बीच उसे हमेशा तिरस्कार और उपेक्षा मिली. खासकर दुर्योधन ने कभी उसे सगे भाई जैसा स्थान नहीं दिया.
युयुत्सु बचपन से ही धर्म और न्याय के पथ पर चला. जब महाभारत युद्ध का समय आया, तब उसने अधर्म के खिलाफ खड़े होकर पांडवों का पक्ष चुना. उसका यह निर्णय चौंकाने वाला था, लेकिन यही उसे महाभारत के महानतम योद्धाओं में शामिल करता है.
महाभारत के युद्ध में दुर्योधन की मृत्यु भीम के हाथों हुई. श्रीकृष्ण के संकेत पर भीम ने उसकी जंघा पर गदा का वार किया, जिससे वह मृत्युशैया पर पहुंच गया. दुर्योधन की मृत्यु के साथ ही युद्ध समाप्ति की घोषणा हुई, लेकिन इसके बाद बड़ा सवाल खड़ा हुआ — कौरवों का अंतिम संस्कार कौन करेगा?
पांडव और कौरव भले ही चचेरे भाई थे, लेकिन चौसर के खेल और द्रौपदी के चीरहरण जैसी घटनाओं ने रिश्तों में ऐसी दरार डाल दी थी कि पांडवों के लिए उनका अंतिम संस्कार करना उचित नहीं लगा. युधिष्ठिर धर्मसंकट में थे और उन्होंने इस कार्य के लिए युयुत्सु को आगे किया.
कौरवों ने जिसे कभी भाई नहीं माना, उसी ने सभी का अंतिम संस्कार किया. धृतराष्ट्र और गांधारी ने भी इस पर सहमति जताई. यह युयुत्सु की महानता थी कि उसने नफरत को भुलाकर धर्म का पालन किया और अपने सौतेले भाइयों को विदा दी.
युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने युयुत्सु को हस्तिनापुर का मंत्री नियुक्त किया. उसे न सिर्फ दरबार में सम्मान मिला बल्कि धृतराष्ट्र और गांधारी की सेवा का दायित्व भी उसी को सौंपा गया. युयुत्सु ने हर भूमिका में खुद को धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय साबित किया.
युयुत्सु ने साबित कर दिया कि सच्चा योद्धा वही होता है जो युद्ध से पहले न्याय और युद्ध के बाद संवेदना का पालन करे. कौरवों की चिता जलाकर उसने यह संदेश दिया कि मृत्यु के बाद कोई शत्रु नहीं होता, सबके साथ समान व्यवहार ही सच्चा धर्म है. First Updated : Wednesday, 14 May 2025