दिग्गज शूटर और ओलिंपियन राजा रणधीर सिंह का निधन, शोक में डूबा खेल जगत

भारतीय खेल इतिहास के सबसे सुनहरे पन्नों में अपना नाम दर्ज कराने वाले दिग्गज निशानेबाज और प्रख्यात खेल प्रशासक रणधीर सिंह का बुधवार को निधन हो गया. उन्होंने 79 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली.

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नई दिल्ली: भारतीय खेल इतिहास के सबसे सुनहरे पन्नों में अपना नाम दर्ज कराने वाले दिग्गज निशानेबाज और प्रख्यात खेल प्रशासक रणधीर सिंह का बुधवार को निधन हो गया. उन्होंने 79 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली. रणधीर सिंह देश के ऐसे इकलौते रत्न थे जिन्होंने न केवल खेल के मैदान पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय खेल संगठनों में भी भारत का परचम बुलंद रखा था.

पहला स्वर्ण पदक

वह एशियाई खेलों के इतिहास में निशानेबाजी में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीतने वाले एथलीट थे. उनके निधन की खबर आते ही देश के खेल प्रेमियों, ओलंपिक बिरादरी और प्रशासनिक हलकों में शोक की लहर दौड़ गई है.

खेल प्रशासन में भी स्थापित किए नए कीर्तिमान

मैदान से संन्यास लेने के बाद रणधीर सिंह ने खेल प्रशासन में भी कई ऐतिहासिक मील के पत्थर स्थापित किए. वह साल 2024 में 'ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया' (OCA) के 44वें जनरल असेंबली में निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाने वाले पहले भारतीय बने थे. साल 2026 की शुरुआत में स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण उनका यह कार्यकाल समय से पहले ही समाप्त हो गया था.

मानद सदस्य का दर्जा

उन्होंने 1987 से 2012 तक लगातार 25 वर्षों तक 'भारतीय ओलंपिक संघ' (IOA) के महासचिव के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं. वह 2001 से 2014 के बीच 'अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी' (IOC) के सक्रिय सदस्य भी रहे, जिसके बाद उन्हें मानद सदस्य का दर्जा दिया गया था.

सफर स्वर्ण अक्षरों में लिखा

रजत और स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने वाले इस सफर के पीछे उनका खेल पृष्ठभूमि से जुड़ा परिवार भी था. उनके पिता भलिंद्र सिंह भी एक प्रख्यात खेल प्रशासक थे. जिन्होंने 1947 से 1992 तक आईओसी (IOC) के सदस्य और दो अलग-अलग कार्यकालों में भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष के रूप में देश में खेलों की बुनियाद मजबूत की थी. रणधीर सिंह का जाना भारतीय खेल कूटनीति के लिए एक अपूरणीय क्षति है.

1978 बैंकॉक गेम्स का ऐतिहासिक स्वर्णिम पल

रणधीर सिंह ने साल 1978 में बैंकॉक में आयोजित हुए एशियाई खेलों के दौरान व्यक्तिगत ट्रैप इवेंट में शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया था. निशानेबाजी के क्षेत्र में इस पहले ऐतिहासिक स्वर्ण ने भारतीय शूटिंग को एक नई दिशा दी थी. खेल के प्रति उनका समर्पण और निरंतरता बहुत लाजवाब थी.

'अर्जुन पुरस्कार' से सम्मानित

उन्होंने साल 1968 से लेकर 1984 तक लगातार पांच बार ओलंपिक खेलों में भारतीय दल का प्रतिनिधित्व किया जो उनकी शीर्ष स्तरीय फिटनेस और खेल कौशल का जीवंत प्रमाण था. खेल जगत में उनके इसी योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने साल 1979 में उन्हें प्रतिष्ठित 'अर्जुन पुरस्कार' से सम्मानित किया था. First Updated : Wednesday, 27 May 2026