लखनऊः उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी को राजनीतिक झटका लगा है. पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री नसीमउद्दीन सिद्दीकी ने अपने दर्जनों समर्थकों के साथ पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. सिद्दीकी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रांतीय अध्यक्ष पद पर कार्यरत थे. उनके इस्तीफे के साथ ही लगभग 72 अन्य नेताओं ने भी कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है, जिनमें करीब दो दर्जन पूर्व विधायक शामिल हैं.
सूत्रों की मानें तो नसीमउद्दीन सिद्दीकी कई महीनों से पार्टी के आंतरिक मामलों को लेकर असंतुष्ट थे. उन्हें पार्टी के भीतर अपेक्षित सम्मान नहीं मिला और उनके राजनीतिक अनुभव का सही ढंग से उपयोग नहीं किया गया. यह भी कहा जा रहा है कि राज्यसभा के लिए मनोनीत न किए जाने से उन्होंने पहले ही असंतोष व्यक्त किया था.
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, हाल ही में राहुल गांधी की रायबरेली यात्रा के दौरान सिद्दीकी को उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी गई थी. इससे उनके नाराजगी और बढ़ गई और उन्होंने पार्टी से इस्तीफा देने का निर्णय लिया. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सिद्दीकी का यह कदम कांग्रेस के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़े चुनावी नुकसान का संकेत है.
सूत्रों की मानें तो नसीमउद्दीन सिद्दीकी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में वापसी कर सकते हैं. कांग्रेस में शामिल होने से पहले उन्हें बसपा का मजबूत नेता माना जाता था. उन्होंने मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में भी कार्य किया था.
सिद्दीकी का जन्म 4 जून 1959 को हुआ था. वे पहली बार 1991 में विधायक बने थे. 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में उन्हें बसपा से निष्कासित कर दिया गया था. इसके बाद, 22 फरवरी को उन्होंने अपने हजारों समर्थकों के साथ दिल्ली स्थित कांग्रेस कार्यालय में शामिल होकर राजनीतिक यात्रा जारी रखी. कांग्रेस में उन्हें उत्तर प्रदेश के प्रमुख मुस्लिम नेताओं में से एक के रूप में पेश किया गया.
यदि सिद्दीकी बसपा में लौटते हैं, तो यह कांग्रेस के लिए बड़े वोट बैंक की हानि का कारण बन सकता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता समुदाय में सिद्दीकी की अच्छी पकड़ मानी जाती है. उनके इस्तीफे से कांग्रेस की रणनीति पर असर पड़ सकता है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सिद्दीकी के इस्तीफे के बाद कांग्रेस को अपने संगठनात्मक ढांचे में सुधार करना होगा. पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी इस कदम से आहत हैं और इसे आगामी चुनावों के दृष्टिकोण से नुकसानदेह बता रहे हैं. इसके साथ ही यह कदम उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा को फिर से सक्रिय भूमिका में ला सकता है.
सिद्दीकी का यह फैसला न केवल कांग्रेस के लिए चुनौती पैदा करता है, बल्कि यह संकेत देता है कि उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव में नेता और उनके वोट बैंक का महत्व काफी अधिक रहेगा. First Updated : Saturday, 24 January 2026