भूपेश बघेल और उनके बेटे चैतन्य ने CBI, ED जांच के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

भूपेश बघेल और उनके बेटे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर छत्तीसगढ़ शराब घोटाले की सीबीआई और ईडी जांच को राज्य की सहमति के बिना अवैध बताया. सुप्रीम कोर्ट 4 अगस्त को इस याचिका पर सुनवाई करेगा.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके बेटे चैतन्य बघेल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 2,161 करोड़ रुपये के कथित शराब घोटाले में केंद्रीय एजेंसियों सीबीआई और ईडी द्वारा की जा रही जांच को चुनौती दी है. याचिका में उन्होंने इन एजेंसियों की कानूनी वैधता और क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

राज्य की स्वीकृति के बिना एजेंसियों की कार्रवाई गैरकानूनी 

भूपेश और चैतन्य बघेल का तर्क है कि जब राज्य सरकार ने सीबीआई और ईडी को दी गई सामान्य सहमति पहले ही रद्द कर दी है, तो इन एजेंसियों को छत्तीसगढ़ में जांच करने का अधिकार नहीं होना चाहिए. भारत के संघीय ढांचे के अंतर्गत, किसी राज्य में सीबीआई या ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियों को जांच करने के लिए राज्य सरकार की सहमति आवश्यक मानी जाती है. उनकी याचिका में यह दावा किया गया है कि राज्य की स्वीकृति के बिना इन एजेंसियों की कार्रवाई गैरकानूनी है.

बघेल परिवार का यह भी आरोप है कि चैतन्य बघेल की हालिया गिरफ्तारी राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है. उन्होंने दावा किया है कि यह कार्रवाई विपक्षी नेताओं को परेशान करने और राजनीतिक रूप से निशाना बनाने का प्रयास है. साथ ही, उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि राज्य में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में वापस ली गई सहमति के बावजूद केंद्रीय एजेंसियां किस आधार पर अपनी कार्रवाई आगे बढ़ा रही हैं.

4 अगस्त 2025 को सुनवाई तय

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त 2025 को सुनवाई तय की है. न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ इस याचिका पर विचार करेगी. यह सुनवाई न केवल छत्तीसगढ़ में सीबीआई और ईडी की जांच को लेकर दिशा तय करेगी, बल्कि भारत में संघीय ढांचे और राज्य-केंद्र के बीच शक्तियों के संतुलन पर भी व्यापक असर डाल सकती है.

यह याचिका ऐसे समय में आई है जब शराब घोटाले की जांच तेज़ हो रही है और चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी को लेकर राजनीतिक हलकों में बहस तेज़ है. अब अदालत में होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई वैधानिक है या नहीं. सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में राज्यों में केंद्रीय एजेंसियों के कामकाज की प्रक्रिया को दिशा दे सकता है.

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