बिहार चुनाव 2025 ने बदली राजनीतिक तस्वीर, 63 सीटों पर PK, बसपा और AIMIM का बड़ा प्रभाव

बिहार चुनावों में एनडीए ने भारी जीत दर्ज की, जबकि महागठबंधन बेहद कमजोर साबित हुआ. परिणामों ने कांग्रेस और विपक्ष को चौंका दिया. जन सुराज, बसपा और AIMIM जैसी छोटी पार्टियों ने भले सीटें कम जीतीं, लेकिन उनके वोटों ने कई क्षेत्रों में नतीजों को निर्णायक रूप से प्रभावित किया.

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

बिहार : बिहार विधानसभा चुनावों ने राज्य की राजनीति में वही प्रभाव छोड़ा है जैसा 2010 में एनडीए की ऐतिहासिक जीत के समय देखने को मिला था. जनता ने एक बार फिर एनडीए को मजबूती से चुना और उसे 202 सीटें देकर सत्ता में वापस पहुंचाया. दूसरी ओर, महागठबंधन का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा और वह केवल 35 सीटों पर सिमट गया. यह परिणाम विपक्ष सहित सभी राजनीतिक धड़ों के लिए अप्रत्याशित साबित हुआ.

इस तरह के परिणाम की उम्मीद नहीं

आपको बता दें कि नतीजे सामने आते ही कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि इस तरह के परिणाम की किसी को उम्मीद नहीं थी. उन्होंने 90 प्रतिशत के करीब स्ट्राइक रेट को राजनीति में असाधारण करार दिया और दावा किया कि पार्टी पूरे चुनावी आंकड़ों का विस्तृत अध्ययन कर रही है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि बिहार की जनता तथा महागठबंधन के सहयोगी दल भी इस परिणाम से उतने ही आश्चर्यचकित हैं जितनी कांग्रेस स्वयं है.

नई शक्ति के रूप में उभरती जन सुराज पार्टी
इन चुनावों की सबसे खास कहानी उन छोटी पार्टियों की भूमिका से जुड़ी रही, जिन्होंने सीधे जीत तो नहीं हासिल की, लेकिन वोटों के बिखराव में बड़ा योगदान दिया. प्रशांत किशोर द्वारा स्थापित जन सुराज पार्टी ने पहली बार चुनाव लड़ते हुए कुल 3.4 प्रतिशत वोट हासिल किए. एक भी सीट न जीतने के बावजूद पार्टी ने विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण पकड़ दिखाई और कई जगहों पर दूसरे या तीसरे स्थान तक पहुंची. जिन 238 सीटों पर उसने उम्मीदवार उतारे, वहां उसका वोट बैंक कई जगह निर्णायक साबित हुआ. 33 सीटों पर उसका वोट शेयर उस अंतर से भी ज्यादा था, जिससे विजेताओं ने जीत दर्ज की. इनमें एनडीए को 18 और महागठबंधन को 13 सीटों पर बढ़त मिली.

बसपा ने 181 सीटों पर हिस्सा लिया
मायावती की बसपा ने भी चुनाव में 181 सीटों पर हिस्सा लिया और एक सीट जीतने में सफल रही. अक्सर बसपा पर भाजपा की “बी-टीम” होने के आरोप लगते रहे हैं, और बिहार के इस चुनाव परिणाम ने इन आरोपों को कुछ हद तक मजबूती दी. 20 ऐसे विधानसभा क्षेत्र रहे जहां बसपा के वोट उस अंतर से ज्यादा थे, जिससे विजेता उम्मीदवार जीते. इनमें से 18 सीटें एनडीए की झोली में गईं. इससे स्पष्ट है कि बसपा की उपस्थिति ने महागठबंधन को ज्यादा नुकसान पहुंचाया.

ओवैसी ने इस बार भी पांच सीटें हासिल की 
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने इस चुनाव में अपना पुराना प्रदर्शन दोहराते हुए पांच सीटें हासिल कीं और एक पर दूसरे स्थान पर रही. उसका वोट शेयर नौ सीटों पर नतीजों को प्रभावित करने लायक रहा, जहां उसके वोट जीत के अंतर से अधिक थे. इन प्रभावित सीटों में से ज्यादातर एनडीए के पक्ष में गईं, जिससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा महागठबंधन के बजाए एआईएमआईएम की ओर झुका.

विपक्षी वोटों का बिखराव और NDA का लाभ
महागठबंधन, विशेषकर उसके प्रमुख घटक राजद और कांग्रेस, इस चुनाव में अपने अब तक के सबसे कमजोर प्रदर्शनों में से एक से गुजरे. राजद ने 23.4 प्रतिशत वोट हासिल किए, लेकिन सीटों की संख्या मात्र 25 रही. वहीं भाजपा और जदयू, जिनका वोट प्रतिशत राजद से कम था, सीटों के मामले में उससे कहीं आगे निकल गए. इसका मुख्य कारण विपक्षी वोटों का तीव्र बिखराव रहा. दलित मतदाता बसपा की ओर झुके, मुस्लिम मतदाता एआईएमआईएम के साथ गए और विकास तथा युवाओं का बड़ा वर्ग जन सुराज पार्टी के साथ हो लिया. इस विभाजन ने उन सीटों पर एनडीए को निर्णायक बढ़त दी जो पहले कांटे की टक्कर में होती थीं.

संयुक्त रूप से 63 सीटों पर छोटी पार्टियों का असर
चुनावी आंकड़ों के अनुसार 63 सीटों पर जन सुराज, बसपा और एआईएमआईएम के संयुक्त वोट इतने अधिक थे कि उन्होंने सीधा परिणाम प्रभावित किया. इन सीटों में से लगभग 70 प्रतिशत, यानी 44 सीटें, एनडीए ने जीतीं. केवल 19 सीटें ही महागठबंधन को मिलीं. इससे यह साफ होता है कि विपक्षी मतों के बिखराव ने एनडीए को अप्रत्याशित मजबूती दिलाई.

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