खून जैसा लाल पेट, गिद्ध जैसा डरावना सिर! आखिर कौन है ये रहस्यमयी ड्रैकुला तोता, जिसे देखकर लोग रह जाते हैं हैरान

इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है ड्रैकुला तोता. यह एक दुर्लभ पक्षी है, जिसका पेट लाल और सिर गिद्ध जैसा दिखाई देता है. आइए जानते हैं इसकी खासियत.

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नई दिल्ली: दुनिया में कई ऐसे पक्षी पाए जाते हैं, जो अपने अनोखे रूप के कारण लोगों को हैरान कर देते हैं. ऐसा ही एक दुर्लभ पक्षी इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है. इसे 'ड्रैकुला तोता' कहा जाता है. पहली नजर में इसका चेहरा किसी डरावनी कहानी के पात्र जैसा लगता है, लेकिन इसकी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है.

कैसा दिखता है ड्रैकुला तोता?

ड्रैकुला तोते का वैज्ञानिक नाम पेस्केट्स पैरट (Pesquet's Parrot) है. इसके शरीर पर काले और धूसर रंग के पंख होते हैं, जबकि पेट का हिस्सा गहरे लाल रंग का दिखाई देता है. इसकी सबसे खास पहचान इसका लगभग बिना पंखों वाला सिर है. यही वजह है कि इसे देखकर लोगों को गिद्ध की याद आ जाती है. हालांकि इसका नाम ड्रैकुला तोता है, लेकिन इसका खून पीने या किसी खतरनाक आदत से कोई संबंध नहीं है. यह पूरी तरह से फलों पर निर्भर रहने वाला पक्षी है.

सिर पर पंख क्यों नहीं होते?

इस पक्षी के सिर पर पंख न होना प्रकृति की एक खास देन है. ड्रैकुला तोता मुख्य रूप से अंजीर और अन्य रसीले फलों को खाता है. फल खाते समय रस और गूदा सिर पर न चिपके, इसलिए इसके सिर पर पंख नहीं होते. इससे उसका सिर साफ रहता है और उसे किसी तरह की परेशानी नहीं होती.

कहां पाया जाता है यह दुर्लभ पक्षी?

ड्रैकुला तोता दुनिया के बड़े तोतों में गिना जाता है. इसकी लंबाई करीब 50 सेंटीमीटर तक हो सकती है. यह मुख्य रूप से पापुआ न्यू गिनी के घने जंगलों में रहता है. यह बेहद शर्मीला पक्षी माना जाता है और इंसानों से दूर रहना पसंद करता है.

क्यों जरूरी है इसका संरक्षण?

यह दुर्लभ पक्षी आज कई खतरों का सामना कर रहा है. जंगलों की कटाई से इसका प्राकृतिक आवास तेजी से कम हो रहा है. वहीं इसके सुंदर लाल पंखों के कारण इसका अवैध शिकार भी किया जाता है. यही वजह है कि इसकी संख्या घटती जा रही है.

यह पक्षी जंगलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. फल खाने के बाद यह बीजों को दूर-दूर तक फैलाता है, जिससे नए पेड़-पौधों के उगने में मदद मिलती है. इसलिए इस अनोखे पक्षी का संरक्षण न सिर्फ इसकी प्रजाति बल्कि पूरे वन पर्यावरण के लिए जरूरी है. First Updated : Wednesday, 17 June 2026

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