बंगाल SIR विवाद में बड़ा फैसला: ट्रिब्यूनल ने आधार कार्ड को माना वैध पहचान, उम्मीदवार के पक्ष में निर्णय
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची विवाद के बीच ट्रिब्यूनल के एक फैसले ने बड़ा मोड़ ला दिया है. आधार कार्ड को पहचान के रूप में मान्यता मिलने से SIR मामले में नई बहस छिड़ गई है.

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर चल रहा विवाद लगातार गहराता जा रहा है. विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के बाद लाखों नाम हटाए जाने से राजनीतिक माहौल गरमा गया है. अब इस मामले में न्यायाधिकरणों ने अपीलों पर सुनवाई शुरू कर दी है.
इसी बीच एक महत्वपूर्ण फैसले में ट्रिब्यूनल ने आधार कार्ड को पहचान के रूप में मान्यता देते हुए एक उम्मीदवार के पक्ष में निर्णय सुनाया है. इस फैसले को SIR विवाद में अहम मोड़ माना जा रहा है, जिससे भविष्य की सुनवाई पर भी असर पड़ सकता है.
फरक्का के उम्मीदवार का मामला
यह मामला फरक्का क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार मोताब से जुड़ा है, जिनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था. ट्रिब्यूनल ने सुनवाई के दौरान पाया कि चुनाव आयोग उनके नाम को हटाने का कोई स्पष्ट कारण पेश नहीं कर सका.
रिटायर्ड जस्टिस टी एस शिवगणनम ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अधिकरण ने संबंधित अधिकारी से नाम हटाने के कारण मांगे थे, लेकिन आयोग ने तकनीकी कारणों का हवाला देकर जानकारी नहीं दी.
आधार कार्ड को मिली मान्यता
ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में आधार कार्ड को पहचान के रूप में स्वीकार किया. हालांकि यह नागरिकता का प्रमाण नहीं है, लेकिन पहचान के तौर पर इसे मान्य माना गया.
2025 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चुनाव आयोग ने आधार को सहायक दस्तावेज के रूप में शामिल किया था.
इसी आधार पर अधिकरण ने माना कि आधार में दर्ज नाम "मोताब शेख" उम्मीदवार की पहचान स्थापित करने के लिए पर्याप्त है.
अन्य दस्तावेजों से भी हुई पुष्टि
ट्रिब्यूनल ने उम्मीदवार द्वारा पेश किए गए पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस की भी जांच की. इन दस्तावेजों में उनका नाम मोताब शेख और पिता का नाम एजाबुल शेख दर्ज पाया गया.
इसके अलावा, उन्होंने नाम में हुई त्रुटि को सुधारने के लिए दिया गया हलफनामा भी प्रस्तुत किया. 2002 के बाद उनका नाम मोताब हेरुल दर्ज हो गया था, जिसे सुधारने के लिए उन्होंने प्रयास किए थे.
परिवार के दस्तावेज भी बने आधार
उम्मीदवार ने अपने चार बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र भी पेश किए. इनमें सबसे बड़े बच्चे (जन्म 1993) के प्रमाण पत्र में उनका नाम मोताब शेख दर्ज था.
ट्रिब्यूनल ने यह भी गौर किया कि उनके सभी भाई-बहनों के नाम मतदाता सूची में मौजूद थे, जबकि केवल उनका नाम हटाया गया था.
अपने फैसले में अधिकरण ने कहा, "मोताब शेख और मोताब हेरुल एक ही व्यक्ति हैं."
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
इस प्रक्रिया से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग को हर नाम जोड़ने या हटाने का कारण दर्ज करना होगा.
अदालत ने कहा था कि अधिकारियों को यह बताना जरूरी है कि किस आधार पर नाम हटाया या शामिल किया गया.
91 लाख नाम हटने से बढ़ा विवाद
SIR अभियान के तहत पश्चिम बंगाल में करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं. हालांकि अंतिम मतदाता सूची की घोषणा अभी बाकी है.
नाम हटाए जाने के बाद प्रभावित मतदाताओं को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार विशेष रूप से गठित न्यायाधिकरणों में अपील करने का अधिकार दिया गया है.
हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि जिन मतदाताओं को ट्रिब्यूनल पात्र ठहराएगा, वे आगामी चुनाव में वोट डाल पाएंगे या नहीं.

