इस्लामपुरा अब नहीं बनेगा कृष्णनगर! नाम बदलने को लेकर हुआ बवाल, घोषणा करके पीछे हटा पाकिस्तान
मंगलवार, 26 मई 2026 को एक अधिकारी ने बताया कि पंजाब सरकार ने लाहौर की सड़कों और गलियों के ऐतिहासिक नाम बहाल करने की योजना टाल दी है। सरकार कट्टरपंथी तत्वों के विरोध से बचना चाहती है।

नई दिल्ली: पाकिस्तान ने लाहौर की कई सड़कों और चौकों के पुराने नाम वापस लाने का ऐलान करके खूब सुर्खियां बटोरी थीं। लाहौर प्रशासन ने कहा था कि इस्लामपुरा इलाका फिर से 'कृष्ण नगर' बन जाएगा। इसी तरह बाबरी मस्जिद चौक को 'जैन मंदिर चौक', सुन्नत नगर को 'संत नगर' और मुस्तफाबाद को 'धर्मपुरा' किया जाना था। लेकिन ये सारे दावे खोखले निकले। अब लाहौर में कोई नाम नहीं बदला जाएगा।
कट्टरपंथियों के विरोध के बाद सरकार ने बदला फैसला
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मंगलवार, 26 मई 2026 को एक अधिकारी ने बताया कि पंजाब सरकार ने लाहौर की सड़कों और गलियों के ऐतिहासिक नाम बहाल करने की योजना टाल दी है। सरकार कट्टरपंथी तत्वों के विरोध से बचना चाहती है।
पहले लाहौर हेरिटेज एरियाज़ रिवाइवल (LAHR) की बैठक में इस फैसले को मंजूरी दी गई थी। इस बैठक की अध्यक्षता PML-N प्रमुख नवाज शरीफ और पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज ने की थी। मुख्यमंत्री कार्यालय ने 20 मार्च को बाकायदा प्रेस नोट जारी कर मीडिया को जानकारी दी थी।
लाहौर प्रशासन ने लिया यू-टर्न
अब लाहौर प्रशासन पलट गया है। लाहौर के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन आर. मुहम्मद अली एजाज ने कहा, "अभी तक ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया है। यह मामला अभी विचाराधीन है।" जब उनसे पूछा गया कि नवाज शरीफ और मरियम नवाज ने तो मंजूरी दे दी थी, तो उन्होंने दोहराया कि कोई फैसला नहीं हुआ है।
धार्मिक रंग देने से डरी सरकार
एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि कुछ कट्टरपंथी तत्वों और व्लॉगर्स ने बंटवारे से पहले के "हिंदू और सिख" नाम बहाल करने पर मरियम नवाज की कड़ी आलोचना की। आलोचकों ने सरकार के फैसले को धार्मिक रंग दे दिया। इसके बाद मरियम नवाज प्रशासन बैकफुट पर आ गया और विरोध से बचने के लिए योजना टाल दी।
विद्वानों से मांगे सुझाव, फिर भी टला फैसला
विरोध के बाद LHAR ने विद्वानों, इतिहासकारों, आर्किटेक्टों और शहरी योजनाकारों की बैठक बुलाई। इसमें लाहौर की सड़कों और मोहल्लों के मूल नाम बहाल करने के "प्रस्ताव" पर सुझाव मांगे गए। बैठक में कहा गया कि यह लाहौर की समृद्ध विरासत और पहचान बचाने का अभियान है। ज्यादातर लोगों ने ऐतिहासिक नाम बहाल करने का समर्थन किया। LHAR ने माना कि लाहौर की ऐतिहासिक पहचान अनमोल विरासत है जिसे सहेजना जरूरी है। फिर भी सरकार ने फैसला लागू नहीं किया।


