संन्यासी बनते-बनते कैसे बन गए बंगाल के मुख्यमंत्री? जानें कैसे सत्ता तक पहुंचे सुवेंदु अधिकारी
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में सुवेंदु अधिकारी ने राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. बचपन में धर्म और अध्यात्म में रुचि रखने वाले सुवेंदु आज बंगाल की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा बन चुका है.

कोलकाता: कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में शनिवार 9 मई का दिन पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ. हजारों समर्थकों की मौजूदगी, भाजपा के शीर्ष नेताओं की भीड़ और जोरदार नारों के बीच सुवेंदु अधिकारी ने राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यह सिर्फ एक शपथ ग्रहण समारोह नहीं था, बल्कि बंगाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत भी था. जिस नेता को कभी ममता बनर्जी का सबसे भरोसेमंद चेहरा माना जाता था, वही आज भाजपा के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस के 15 साल पुराने शासन का अंत करने वाला चेहरा बन गया. सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर भाजपा ने सुवेंदु अधिकारी पर इतना बड़ा दांव क्यों लगाया और वह किन वजहों से पार्टी की पहली पसंद बने?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस बार बड़ा राजनीतिक इतिहास रच दिया. 294 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी ने 207 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई. चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि राज्य की राजनीति में जनता बदलाव चाहती थी. चुनाव जीतने के बाद भाजपा विधायक दल की बैठक आयोजित की गई, जिसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहे. बैठक में सुवेंदु अधिकारी को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुना गया. इसके साथ ही यह लगभग तय हो गया था कि बंगाल की पहली भाजपा सरकार की कमान उन्हीं के हाथ में जाएगी.
बचपन में था अध्यात्म की ओर झुकाव
सुवेंदु अधिकारी का जन्म साल 1970 में पश्चिम बंगाल के पूर्व मिदनापुर जिले के कर्कुली गांव में हुआ था. राजनीति उन्हें विरासत में मिली. उनके पिता शिशिर अधिकारी लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रहे और बाद में ममता बनर्जी के साथ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. घर का माहौल राजनीतिक जरूर था, लेकिन बचपन में सुवेंदु का झुकाव राजनीति से ज्यादा धर्म और अध्यात्म की ओर था. परिवार वालों को लगता था कि उनका बेटा शायद साधु-संतों की राह पकड़ लेगा.
सुवेंदु अधिकारी नियमित रूप से रामकृष्ण मिशन जाया करते थे. उन्हें घर से जो भी पैसे मिलते, वह कई बार चुपचाप मिशन में दान कर देते थे. परिवार के लोग इस आदत को देखकर चिंतित भी हो जाते थे. उन्हें डर था कि कहीं सुवेंदु अचानक घर छोड़कर संन्यासी न बन जाएं. लेकिन समय के साथ उनकी सोच बदली. कॉलेज जीवन में आते-आते उन्होंने सार्वजनिक जीवन और राजनीति में रुचि लेनी शुरू कर दी. कांथी के प्रभात कुमार कॉलेज से उन्होंने छात्र राजनीति में कदम रखा और धीरे-धीरे संगठन के भीतर अपनी अलग पहचान बना ली.
छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर
सुवेंदु अधिकारी ने जमीनी स्तर से राजनीति शुरू की. छात्र राजनीति के दौरान उन्होंने स्थानीय मुद्दों को उठाना शुरू किया और युवाओं के बीच मजबूत पकड़ बनाई. धीरे-धीरे पूर्व मिदनापुर जिले में उनकी पहचान बढ़ने लगी. साल 1995 में वह पहली बार कांथी नगर पालिका में पार्षद चुने गए. यह उनके राजनीतिक करियर का पहला बड़ा पड़ाव था. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
नंदीग्राम आंदोलन ने बदल दी राजनीति
सुवेंदु अधिकारी की राजनीति में सबसे बड़ा मोड़ साल 2007 में आया. उस समय वाम मोर्चा सरकार ने नंदीग्राम में केमिकल हब बनाने के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहित करने का फैसला लिया था. इस फैसले के खिलाफ बड़ा आंदोलन शुरू हुआ और सुवेंदु अधिकारी इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे.
उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को एकजुट किया और आंदोलन को मजबूत बनाया. नंदीग्राम आंदोलन सिर्फ जमीन बचाने की लड़ाई नहीं रहा, बल्कि यह बंगाल में सत्ता परिवर्तन की शुरुआत बन गया. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इसी आंदोलन ने वामपंथी सरकार की नींव हिला दी थी और बाद में ममता बनर्जी के सत्ता में आने का रास्ता तैयार हुआ. इस आंदोलन के बाद सुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ गया.
तृणमूल कांग्रेस में बढ़ता प्रभाव
नंदीग्राम आंदोलन की सफलता के बाद सुवेंदु अधिकारी तृणमूल कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए. साल 2009 और 2014 में वह लोकसभा सांसद चुने गए. बाद में उन्होंने राज्य की राजनीति में वापसी की और 2016 में नंदीग्राम विधानसभा सीट से जीत दर्ज की. ममता बनर्जी सरकार में उन्हें परिवहन और सिंचाई जैसे अहम विभागों की जिम्मेदारी दी गई. संगठन और प्रशासन दोनों पर उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती गई.
टीएमसी से दूरी और भाजपा में एंट्री
समय के साथ तृणमूल कांग्रेस के भीतर मतभेद बढ़ने लगे. पार्टी में अभिषेक बनर्जी का प्रभाव बढ़ने के बाद सुवेंदु अधिकारी खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे. आखिरकार दिसंबर 2020 में उन्होंने टीएमसी छोड़ने का फैसला कर लिया. इसके कुछ ही दिनों बाद उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया. उस समय उनके इस फैसले को बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा झटका माना गया. भाजपा ने भी उन्हें तुरंत बड़ा चेहरा बनाकर पेश किया.
ममता बनर्जी के खिलाफ सबसे बड़ी चुनौती
भाजपा में शामिल होने के बाद सुवेंदु अधिकारी सीधे ममता बनर्जी के खिलाफ सबसे मजबूत नेता बनकर उभरे. 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर दोनों नेताओं के बीच सीधा मुकाबला हुआ. यह चुनाव सिर्फ एक सीट की लड़ाई नहीं था, बल्कि बंगाल की राजनीति की सबसे बड़ी प्रतिष्ठा की जंग बन गया था. आखिरकार सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराकर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. इसके बाद भाजपा ने उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया. लगातार आक्रामक राजनीति और जमीनी पकड़ की वजह से वह पार्टी के सबसे भरोसेमंद चेहरों में शामिल हो गए.
भाजपा ने सुवेंदु पर ही क्यों लगाया दांव?
भाजपा नेतृत्व को बंगाल में ऐसे नेता की जरूरत थी, जो राज्य की राजनीति, संगठन और सामाजिक समीकरणों को अच्छी तरह समझता हो. सुवेंदु अधिकारी के पास यह अनुभव पहले से मौजूद था. उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी जमीनी पकड़ मानी जाती है. पूर्व मिदनापुर से लेकर दक्षिण बंगाल तक उनका मजबूत जनाधार है. इसके अलावा वह लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस में रह चुके थे, इसलिए उन्हें विपक्ष की रणनीति की भी पूरी जानकारी थी. भाजपा ने यह भी समझा कि बंगाल जैसे राज्य में स्थानीय चेहरे के बिना लंबे समय तक राजनीति करना मुश्किल होगा. ऐसे में सुवेंदु अधिकारी पार्टी के लिए सबसे मजबूत विकल्प बनकर सामने आए.
मुख्यमंत्री बनने तक का सफर
करीब चार दशक तक राजनीति में सक्रिय रहने के बाद अब सुवेंदु अधिकारी बंगाल की सत्ता के सबसे बड़े केंद्र में पहुंच चुके हैं. छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर अब मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गया है. एक समय धर्म और अध्यात्म में रुचि रखने वाला युवक आज बंगाल की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा बन चुका है. नंदीग्राम आंदोलन से लेकर ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर करने तक, सुवेंदु अधिकारी की राजनीतिक यात्रा बंगाल की सबसे चर्चित कहानियों में शामिल हो गई है.


