विरासत से मिली सियासत...कौन हैं शिवेश कुमार ? नितिन नवीन के साथ बिहार से जाएंगे राज्यसभा

बिहार में 5 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं. भाजपा ने नितिन नवीन और शिवेश कुमार राम को राज्यसभा भेजने का फैसला किया है. इन दोनों ही नेताओं को सियासत विरासत में मिली है. नवीन कायस्थ समुदाय से आते हैं तो वहीं, शिवेश दलित समुदाय से आनेवाले नेता हैं.

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

पटना : बिहार की राजनीति में भाजपा ने एक बार फिर सबको चौंकाते हुए राज्यसभा के लिए अपने उम्मीदवारों की आधिकारिक घोषणा कर दी है. पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने नितिन नवीन और शिवेश कुमार राम के नामों पर अपनी अंतिम मुहर लगाई है. इन दोनों ही चेहरों को राजनीति विरासत में मिली है. जहाँ नितिन नवीन संगठन के शीर्ष पदों पर आसीन एक जाने-माने नाम हैं. वहीं शिवेश कुमार राम लो-प्रोफाइल रहकर काम करने वाले कर्मठ नेता माने जाते हैं. इस बड़े फैसले से कइयों के अरमानों पर पानी फिरा है.

विरासत और सियासत का अनूठा संगम

आपको बता दें कि नितिन नवीन और शिवेश कुमार राम दोनों ही प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवारों की अगली कड़ी हैं. नितिन नवीन पूर्व दिग्गज विधायक नवीन किशोर सिन्हा के सुपुत्र हैं और वर्तमान में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. दूसरी ओर. शिवेश कुमार राम पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व आईएएस अधिकारी मुनीलाल के बेटे हैं. शिवेश का चयन भाजपा की उस रणनीति को दर्शाता है. जिसमें वह पुराने वफादार परिवारों और समर्पित जमीनी कार्यकर्ताओं को मुख्य धारा में लाने का सार्थक प्रयास कर रही है.

शिवेश कुमार राम का राजनीतिक सफर

शिवेश कुमार राम अमूमन लाइमलाइट और शोर-शराबे से दूर रहने वाले गंभीर नेता हैं. उन्होंने अपनी चुनावी पारी की शुरुआत वर्ष 2010 में भोजपुर जिले की अगियांव विधानसभा सीट से विधायक बनकर की थी. हाल ही में संपन्न 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन पर भरोसा जताते हुए सासाराम से टिकट दिया था. हालांकि. उन्हें वहां सफलता नहीं मिल सकी. रांची विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक शिवेश अब उच्च सदन में बिहार का प्रतिनिधित्व करेंगे. जहाँ वे सामाजिक और क्षेत्रीय मुद्दों को मजबूती से रखेंगे.

दलित राजनीति में एक नया अध्याय

भाजपा के इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही शिवेश कुमार राम बिहार भाजपा के इतिहास में राज्यसभा जाने वाले दूसरे दलित चेहरा बन चुके हैं. उनसे पहले यह विशिष्ट गौरव कामेश्वर पासवान को प्राप्त था. जो पटना के फतुहा निवासी थे और बिहार सरकार में कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी भी निभा चुके थे. दलित समुदाय को सदन में प्रतिनिधित्व प्रदान कर भाजपा ने राज्य में एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक संदेश दिया है. पार्टी का यह कदम दलितों को जोड़ने की एक सोची-समझी पहल है.

कई दिग्गजों की उम्मीदें हुईं धराशाई

राज्यसभा के लिए नामों के अंतिम चयन के दौरान बिहार भाजपा की ओर से कई अनुभवी चेहरों की एक लंबी सूची भेजी गई थी. इस सूची में सुरेश रूंगटा. प्रेम रंजन पटेल. जगन्नाथ ठाकुर और राधामोहन शर्मा जैसे कद्दावर नेताओं के नाम प्रमुखता से शामिल थे. यहाँ तक कि झारखंड के राज्यसभा सदस्य दीपक प्रकाश का नाम भी खूब चर्चा में रहा. लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने इन सभी नामों को दरकिनार करते हुए नए चेहरों को चुना. सूची में रह गए इन पांच नामों पर मुहर न लगने से कइयों को निराशा है.

पवन सिंह की चर्चाओं पर विराम

नामांकन से पहले भोजपुरी सिने जगत के दिग्गज अभिनेता और गायक पवन सिंह के नाम की भी राजनीतिक गलियारों में भारी चर्चा थी. उनके समर्थकों को पूरी उम्मीद थी कि भाजपा उन्हें राज्यसभा भेजकर एक बड़ा धमाका कर सकती है. सोशल मीडिया से लेकर चौराहों तक केवल पवन सिंह के नाम की ही अटकलें लगाई जा रही थीं. लेकिन जैसे ही अंतिम सूची जारी हुई. तो सारी पुरानी चर्चाएं और कयास धरी की धरी रह गई. भाजपा ने सेलिब्रिटी के बजाय संगठन के वफादार चेहरों पर ही भरोसा जताया है.

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