Supreme Court on Freebies: सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों से पहले मुफ्त रेवड़ियां बांटने की घोषणा पर अपनी नाराजगी व्यक्त की है. अदालत ने कहा कि ऐसे मुफ्त सुविधाओं की वजह से लोग काम करने के लिए इच्छुक नहीं रहते हैं, क्योंकि उन्हें बिना काम किए मुफ्त राशन और धनराशि मिल रही है. इस टिप्पणी के दौरान, सुप्रीम कोर्ट शहरी गरीबी उन्मूलन मिशन से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें बेघर लोगों के लिए आश्रय का प्रावधान किया जा रहा है.
जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि इन मुफ्त योजनाओं के कारण लोग राष्ट्र के विकास में योगदान देने के लिए प्रेरित नहीं हो रहे हैं. अदालत ने यह भी कहा कि जरूरतमंदों को मुख्यधारा से जोड़ने की आवश्यकता है ताकि वे समाज में अपना योगदान दे सकें. जस्टिस गवई ने कहा, "हम बेघर लोगों के लिए सरकार की चिंता की सराहना करते हैं, लेकिन क्या यह बेहतर नहीं होगा कि उन्हें मुख्यधारा का हिस्सा बनाया जाए और वे देश के विकास में योगदान कर सकें?"
केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार शहरी गरीबी उन्मूलन मिशन को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है, जिसमें शहरी बेघर लोगों के लिए आश्रय की व्यवस्था भी शामिल है. अदालत ने उनसे यह सुनिश्चित करने को कहा कि यह मिशन कब तक लागू होगा. इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई छह हफ्ते बाद तय की है.
इससे पहले, अक्टूबर 2024 में भी सुप्रीम कोर्ट ने फ्रीबीज को लेकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा था. उस याचिका में चुनावों के दौरान मुफ्त उपहारों की घोषणा के खिलाफ सवाल उठाया गया था और अदालत से यह अनुरोध किया गया था कि वह चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश दे कि राजनीतिक पार्टियां चुनाव से पहले मुफ्त रेवड़ियों का वादा न करें.
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम यह दर्शाता है कि मुफ्त उपहारों की घोषणा से संबंधित प्रथाओं पर गहरी चिंता जताई जा रही है, क्योंकि यह लोगों को काम करने के लिए प्रेरित करने की बजाय मुफ्त लाभों पर निर्भर बना सकती है. First Updated : Wednesday, 12 February 2025