सीएम हेमंत सोरेन को लगा तगड़ा झटका, जमीन घोटाले से जुड़े PMLA केस में डिस्चार्ज पिटीशन खारिज
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को तगड़ा कानूनी झटका लगा है. जमीन घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से दायर की गई डिस्चार्ज पिटीशन को खारिज किया गया है.

झारखंड: झारखंड की राजनीति और न्यायिक गलियारों से इस वक्त की एक बड़ी खबर सामने आ रही है. आगामी राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को तगड़ा कानूनी झटका लगा है. रांची स्थित विशेष पीएमएलए अदालत ने जमीन घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से दायर की गई डिस्चार्ज पिटीशन को सिरे से खारिज कर दिया है.
कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया
ED द्वारा की गई गिरफ्तारी और कार्रवाई के खिलाफ मुख्यमंत्री की कानूनी टीम ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसे कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया.
जानें क्या है मामला?
हेमंत सोरेन से जुड़ा यह पूरा विवाद रांची के बड़गाई अंचल अंतर्गत आने वाले शांति नगर क्षेत्र में स्थित करीब 8.86 एकड़ जमीन के कथित अवैध अधिग्रहण और उस पर जबरन कब्जे से संबंधित है. केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी इस पूरे जमीन सौदे में हुए वित्तीय हेरफेर और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की सघन जांच कर रही है. इसी मामले में अपनी गिरफ्तारी को आधार बनाते हुए मुख्यमंत्री सोरेन ने अदालत में याचिका देकर खुद को आरोपों से मुक्त करने की गुहार लगाई थी.
दिसंबर 2025 में दायर हुई थी याचिका
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से 5 दिसंबर 2025 को विशेष अदालत में यह डिस्चार्ज पिटीशन दाखिल की गई थी. इस याचिका में सीएम सोरेन के वकीलों ने दलील दी थी कि उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह निराधार और राजनीति से प्रेरित हैं.
कोई ठोस सबूत नहीं हैं
याचिका में यह भी दावा किया गया था कि प्रवर्तन निदेशालय के पास केस चलाने के लिए कोई ठोस या पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं और उन्हें इस मामले में सिर्फ अनावश्यक रूप से फंसाया जा रहा है. अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री पर जिस स्तर के गंभीर आरोप लगे हैं और ईडी उनके खिलाफ जो जांच कर रही है.
क्या होती है डिस्चार्ज पिटीशन?
कोई भी आरोपी अदालत में डिस्चार्ज पिटीशन तब दाखिल कर सकता है जब उसे किसी आपराधिक मामले में आरोपी तो बनाया गया हो, लेकिन उसके खिलाफ अदालत में औपचारिक रूप से आरोप तय न हुए हों. यदि अदालत जांच एजेंसी की चार्जशीट के आधार पर आरोप तय कर देती है, तो उसके बाद सामान्य डिस्चार्ज पिटीशन को मंजूर नहीं किया जाता है.


