लालू से मांझी तक बेटों ने संभाली सियासत, अब नीतीश कुमार के बेटे निशांत के कदम से फिर गरमाई बिहार राजनीति
बिहार की राजनीति में परिवार और विरासत का रिश्ता पुराना है। कई बड़े नेताओं के बेटे राजनीति में आए और पहचान बनाई। अब चर्चा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत भी सियासत में कदम रख सकते हैं।

बिहार की राजनीति को ध्यान से देखें तो एक खास बात साफ दिखती है। यहां नेताओं के बाद उनके बेटे भी राजनीति में आते रहे हैं। यह सिलसिला नया नहीं है। कई दशकों से चलता आ रहा है। किसी नेता की पहचान मजबूत होती है तो उसके परिवार का नाम भी राजनीति में उतरता है। समर्थकों को भी वही चेहरा पहचान में आता है। यही वजह है कि बिहार की सियासत में परिवार की विरासत अक्सर आगे बढ़ती दिखती है। अब इसी चर्चा के बीच एक नया नाम सामने आ रहा है।
क्या लालू परिवार सबसे बड़ा उदाहरण है?
अगर बिहार में राजनीतिक परिवारों की बात हो तो सबसे पहले लालू प्रसाद यादव का नाम आता है। लालू और राबड़ी देवी की राजनीतिक विरासत अब उनके बेटों के पास है। तेजस्वी यादव आज राज्य की राजनीति का बड़ा चेहरा बन चुके हैं। वह नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं। वहीं तेज प्रताप यादव भी सक्रिय राजनीति में मौजूद हैं। दोनों भाइयों ने अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। यही कारण है कि लालू परिवार को बिहार की सबसे चर्चित राजनीतिक विरासत माना जाता है।
क्या मिश्रा परिवार की विरासत भी मजबूत है?
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा का नाम भी बड़े नेताओं में गिना जाता है। उनकी राजनीतिक विरासत को उनके बेटे नीतीश मिश्रा आगे बढ़ा रहे हैं। नीतीश मिश्रा लंबे समय से सक्रिय राजनीति में हैं। वह बिहार सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। भाजपा के प्रमुख नेताओं में उनकी गिनती होती है। उनके काम और पहचान ने यह दिखाया कि राजनीतिक विरासत सिर्फ नाम से नहीं बल्कि काम से भी बनती है। यही वजह है कि मिश्रा परिवार की पहचान अब भी राजनीति में बनी हुई है।
क्या भागवत झा आजाद का परिवार भी राजनीति में आया?
पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के बेटे कीर्ति आजाद भी राजनीति में उतरे। पहले उन्होंने क्रिकेट की दुनिया में नाम कमाया। भारत के लिए क्रिकेट खेला और पहचान बनाई। बाद में उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना। सांसद बने और लंबे समय तक संसद में बिहार की आवाज उठाते रहे। इस तरह उन्होंने खेल से राजनीति तक का सफर तय किया। कीर्ति आजाद का उदाहरण बताता है कि बिहार में कई नेता ऐसे भी रहे जिन्होंने अलग पहचान बनाने के बाद राजनीति में कदम रखा।
क्या मांझी परिवार भी इसी रास्ते पर है?
पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का परिवार भी राजनीति में सक्रिय है। उनके बेटे संतोष कुमार सुमन अब एक पहचाना हुआ चेहरा बन चुके हैं। वह हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। बिहार सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं। इससे साफ दिखता है कि मांझी परिवार की राजनीतिक विरासत भी आगे बढ़ रही है। बिहार की राजनीति में यह सिलसिला लगातार दिखाई देता है।
क्या पुराने दौर में भी ऐसा होता था?
अगर थोड़ा पीछे जाएं तो यह परंपरा पहले भी दिखाई देती है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा के बेटे निखिल कुमार भी राजनीति में आए। उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। इसी तरह समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर भी राजनीति में सक्रिय रहे। वह राज्यसभा के सदस्य भी बने। यानी बिहार में राजनीतिक विरासत का इतिहास काफी पुराना है। कई परिवारों में यह सिलसिला पीढ़ियों तक चलता रहा है।
क्या अब निशांत कुमार की एंट्री होने वाली है?
अब चर्चा का केंद्र एक नया नाम है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार। लंबे समय तक वह राजनीति से दूर रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में उनके राजनीति में आने की चर्चा तेज हो गई है। अगर निशांत सक्रिय राजनीति में आते हैं तो यह बिहार में एक और राजनीतिक विरासत का विस्तार होगा। फिलहाल सबकी नजर इसी सवाल पर टिकी है कि क्या निशांत भी अपने पिता की राह पर चलेंगे या राजनीति से दूरी बनाए रखेंगे।


