'महिलाओं को कोई नौकरी नहीं देगा...'सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स लीव की मांग पर दिया करारा जवाब, CJI की 5 बड़ी बातें

आज सुप्रीम कोर्ट ने पीरियड्स लीव की याचिका पर सुनवाई की. उन्होंने साफ-साफ इस याचिका को इनकार करते हुए कई अहम बात बताई.

Sonee Srivastav

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान अनिवार्य छुट्टी देने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि यह नीतिगत मामला है, इसलिए याचिकाकर्ता को सरकार के पास जाना चाहिए. अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की, जो महिलाओं के रोजगार और अधिकारों से जुड़ी है.

किसने दायर की याचिका?

यह याचिका वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दायर की थी. उन्होंने तर्क दिया कि मातृत्व अवकाश जैसा प्रावधान होने पर मासिक धर्म के दौरान भी छुट्टी मिलनी चाहिए. उन्होंने सभी राज्यों को इस पर कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की थी. कुछ निजी कंपनियां और केरल सरकार पहले से ही ऐसी छुट्टी दे रही हैं, लेकिन याचिकाकर्ता चाहते थे कि इसे पूरे देश में अनिवार्य किया जाए.

सुप्रीम कोर्ट की 5 बड़ी टिप्पणियां

  1. महिलाओं को कमजोर दिखाने का खतरा: अदालत ने कहा कि ऐसी याचिकाएं महिलाओं को कमजोर या हीन दिखाने का माहौल बना सकती हैं। इससे लग सकता है कि मासिक धर्म कोई बुरी या नकारात्मक चीज है, जबकि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है.
  2. डर और गलत धारणा: पीठ ने टिप्पणी की कि ये मांगें डर फैला सकती हैं और समाज में यह राय बन सकती है कि मासिक धर्म के कारण महिलाएं सामान्य काम नहीं कर सकती.
  3. अनिवार्य छुट्टी से नौकरियां प्रभावित होगी: मुख्य न्यायाधीश ने चिंता जताई कि अगर इसे कानूनन अनिवार्य कर दिया गया तो कंपनियां महिलाओं को महत्वपूर्ण पदों या जिम्मेदारियों वाली नौकरियां देने से बच सकती है. इससे महिलाओं का करियर प्रभावित हो सकता है.
  4. नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से कतराएंगे: अदालत ने साफ कहा कि अनिवार्य छुट्टी के नियम से "कोई भी महिलाओं को नौकरी नहीं देगा". सरकारी नौकरियों या न्यायपालिका में भी उनके रास्ते बंद हो सकते हैं. स्वैच्छिक छुट्टी अच्छी है, लेकिन जबरदस्ती नियम बनाने से उल्टा असर पड़ सकता है.
  5. सरकार नीति बनाए, सभी पक्षों से बात करे: कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय या संबंधित विभाग सभी हितधारकों से चर्चा करके मासिक धर्म अवकाश पर उचित नीति बनाने पर विचार करें.

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