सिर्फ उन्नीस दिनों में सोलह मौतें, क्या वोटर सत्यापन प्रक्रिया चुनावी व्यवस्था का काला अध्याय बन गई है?

आप सांसद संजय सिंह ने संसद को चेताया है कि जारी एसआईआर प्रक्रिया से बीएलओ पर अत्यधिक दबाव है और इससे आगामी चुनावों से पहले लाखों लोगों के मतदान अधिकार छिन सकते हैं।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने राज्यसभा में चेतावनी दी है कि विशेष सघन पुनरीक्षण यानी एसआईआर नाम की प्रक्रिया से लोगों का वोट कट रहा है और बीएलओ नाम के कर्मचारियों पर इतना दबाव है कि केवल उन्नीस दिनों में सोलह लोगों की मौत हो चुकी है। उनका कहना है कि काम का बोझ, मानसिक तनाव और निलंबन का डर कर्मचारियों को तोड़ रहा है। एसआईआर में पुराने पंजीकृत मतदाताओं से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जा रहे हैं जिन्हें जुटाना आम आदमी के लिए आसान नहीं होता। यह स्थिति लोकतंत्र की जड़ को कमजोर कर रही है। सांसद ने मांग की है कि इस प्रक्रिया को तुरंत रोका जाए।

क्यों काटे जा रहे नाम?

संजय सिंह का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बिना उचित सत्यापन के बिहार में पैंसठ लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए। कई जगह हटाए गए नाम चुनावों में जीत के अंतर से भी ज्यादा हैं। इससे संदेह पैदा होता है कि कहीं महिलाओं, प्रवासियों और अल्पसंख्यकों को मताधिकार से दूर करने की कोशिश तो नहीं हो रही। उन्होंने कहा कि नाम हटाने का तरीका अपारदर्शी है और अपील का प्रभावी माध्यम भी नहीं है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले चुनावों पर गंभीर असर पड़ेगा।

क्या बीएलओ खतरे में हैं?

उन्होंने बताया कि बीएलओ रात तक काम कर रहे हैं, ऐप बार बार फेल हो रही है, असुरक्षित हालात में फील्ड में जाना पड़ता है और ऊपर से रैंकिंग के आधार पर कार्रवाई का डर भी दिया जा रहा है। इसी कारण कुछ कर्मचारियों ने आत्महत्या तक कर ली। उन्होंने इसे मानवीय संकट कहा और संसद से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की। उनका कहना है कि इतनी जल्दी प्रक्रिया कराकर चुनाव आयोग ने जमीन से जुड़े कर्मचारियों को संकट में डाल दिया है।

क्या समय सीमा अव्यावहारिक है?

संजय सिंह ने बताया कि दूसरे चरण का सत्यापन चार दिसंबर तक खत्म करने को कहा गया है जबकि 2003 में इसी काम के लिए छह से आठ महीने का समय दिया गया था। अब मात्र सत्तानवे दिनों में घर घर जांच, दस्तावेज सत्यापन और सूची निर्माण पूरा करने का दबाव है। यह बिल्कुल अव्यावहारिक है और कई गलतियां हो सकती हैं। इतनी जल्दी के चक्कर में लाखों लोगों के वोट कट सकते हैं।

क्या पुराने दस्तावेज मान्य नहीं?

साल 2003 के नियमों में कहा गया था कि मौजूदा मतदाता सूची और वोटर आईडी को प्राथमिक दस्तावेज माना जाएगा। लेकिन 2025 के एसआईआर में उन्हीं से भी नए कागज़ मांगे जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज ने भी टिप्पणी की कि इस देश में हर किसी के पास सभी दस्तावेज नहीं होते, मेरे पास भी जन्म प्रमाणपत्र नहीं है। इससे साफ होता है कि यह प्रक्रिया लोगों को बाहर करने वाली ज्यादा लगती है न कि सुधार करने वाली।

क्या बड़ा विस्तार जोखिमभरा?

संजय सिंह ने कहा कि बिहार में गड़बड़ी होने के बावजूद 19 नवंबर से एसआईआर को बिना सुधार किए बारह राज्यों में बढ़ा दिया गया है जिसमें तीन सौ इक्कीस जिले और इक्यावन करोड़ मतदाता आते हैं। इतना बड़ा विस्तार बिना तैयारी के लोगों के मताधिकार को छीन सकता है। इससे चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास घट सकता है। उन्होंने कहा कि यह जल्दबाजी लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा सकती है।

क्या संसद करेगी हस्तक्षेप?

सिंह ने राज्यसभा में नियम 267 के तहत नोटिस देकर कहा है कि सभी काम रोककर इस मुद्दे पर तुरंत चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह अनुच्छेद 14, 21 और 326 के अधिकारों पर सीधा आघात है। उन्होंने मांग की कि एसआईआर को रोका जाए, voter list बहाल की जाए और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी तय की जाए। यह मुद्दा पूरे देश के लिए गंभीर है और अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो करोड़ों लोगों का वोट खतरे में पड़ सकता है।

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