आज है राष्ट्रीय युवा दिवस: स्वामी विवेकानंद के अनसुने किस्से, जो आज भी युवाओं को आत्मबल देते हैं

स्वामी विवेकानंद सिर्फ संत नहीं, बल्कि युवाओं के लिए जोश और हिम्मत की जीती-जागती मिसाल बने.12 जनवरी 1863 को जन्मे नरेंद्र ने कम उम्र में ही दुनिया को चौंकाया. आज भी उनकी बातें दिल को छूती हैं और रास्ता दिखाती हैं. उनकी जयंती पर आइए, उनके जीवन के कुछ बेहद रोचक और अनसुने किस्से जानें.

Goldi Rai
Edited By: Goldi Rai

स्वामी विवेकानंद केवल आध्यात्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि वे भारत की युवा चेतना को जगाने वाली वह शक्ति थे, जिसने गुलाम मानसिकता में जकड़े समाज को आत्मविश्वास और आत्मगौरव का पाठ पढ़ाया. 12 जनवरी 1863 को जन्मे विवेकानंद ने अपने विचारों से न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया को यह एहसास कराया कि आत्मबल ही सबसे बड़ी शक्ति है.

अक्सर उन्हें शिकागो के ऐतिहासिक भाषण, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य और वेदांत दर्शन के प्रचारक के रूप में जाना जाता है, लेकिन उनके जीवन में ऐसे कई प्रसंग भी हैं, जो कम चर्चित होने के बावजूद बेहद प्रेरक हैं. ये घटनाएं उनके व्यक्तित्व की गहराई और उनके विचारों की प्रामाणिकता को उजागर करती हैं.

बचपन से ही सवालों से भरा मन

स्वामी विवेकानंद बचपन से ही निडर और जिज्ञासु थे. वे साधुओं और पंडितों से एक ही सवाल करते थे. क्या आपने भगवान को देखा है? अधिकांश लोग टालमटोल करते, लेकिन यही सवाल उन्हें रामकृष्ण परमहंस तक ले गया. रामकृष्ण का सीधा उत्तर हां, मैंने भगवान को वैसे ही देखा है जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूं. 

संगीत से साधना तक का सफर

नरेंद्रनाथ दत्त एक उम्दा गायक थे और शास्त्रीय संगीत व बंगाली भजनों में उनकी खास रुचि थी. वे रामकृष्ण परमहंस के सामने अक्सर गाया करते थे. जब किसी ने कहा कि वे बड़े गायक बन सकते हैं, तो उनका उत्तर था- गर संगीत आत्मा को ईश्वर से जोड़ दे, तो वही मेरा संगीत है. यही सोच आगे चलकर उनके संन्यास और सेवा के मार्ग की नींव बनी.

गरीबी के दिनों में भी आत्मबल

पिता की मृत्यु के बाद परिवार आर्थिक संकट में डूब गया. नौकरी की तलाश में भटकते हुए नरेंद्र कई बार निराश हुए, लेकिन रामकृष्ण के कहने पर जब वे मां काली के मंदिर पहुंचे, तो उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं मांगा. उनके शब्द थे मां, मुझे विवेक और वैराग्य दो.

संन्यास और नाम का अर्थ

संन्यास लेने के बाद नरेंद्रनाथ का नाम विवेकानंद पड़ा. ‘विवेक’ यानी सही-गलत का बोध और ‘आनंद’ यानी आत्मिक सुख यही उनके जीवन का सार था.

अपमान से जन्मी सेवा भावना

भारत भ्रमण के दौरान एक गांव में उन्हें भिक्षा मांगने पर अपमानित किया गया. तब उन्होंने कहा कि जब तक भारत के लोग भूखे हैं, मुझे मोक्ष नहीं चाहिए. यही भावना आगे चलकर रामकृष्ण मिशन की सेवा दृष्टि बनी.

शिकागो से पहले संघर्ष

1893 में शिकागो जाने से पहले उनके पास साधन नहीं थे. लोगों ने मजाक उड़ाया, लेकिन राजा अजीत सिंह की मदद से यात्रा संभव हुई. विवेकानंद का विश्वास था. अगर एक व्यक्ति भी मेरे विचारों पर भरोसा कर ले, तो रास्ता बन जाता है.

विचारों का सम्मान

शिकागो में एक बार होटल में साधारण वेश के कारण उन्हें रोका गया. बाद में आयोजकों ने माफी मांगी, तो उन्होंने कहा कि सम्मान कपड़ों से नहीं, विचारों से मिलता है.

नस्लभेद पर निर्भीक स्वर

अमेरिका में रहते हुए उन्होंने रंगभेद की खुलकर आलोचना की और कहा कि जो समाज मनुष्य को मनुष्य नहीं मानता, वह आध्यात्मिक नहीं हो सकता.

जीवन की गहराई

उन्होंने पहले ही कहा था कि वे चालीस वर्ष से अधिक नहीं जिएंगे. 39 वर्ष की उम्र में ध्यानावस्था में उनका देहांत हुआ, यह साबित करता है कि जीवन की लंबाई नहीं, उसका प्रभाव मायने रखता है.

युवाओं के लिए संदेश

विवेकानंद का मंत्र- उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए. आज भी युवाओं के लिए सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत है. इसी वजह से 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है.

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