पहली बार भारत में किसी को मिली इच्छामृत्यु की अनुमति! इंडिया में इसको लेकर क्या हैं नियम? जान लें पूरी जानकारी
गाजियाबाद के हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है. यह भारत में पहला ऐसा मामला है जहां कोर्ट ने स्पष्ट रूप से लाइफ सपोर्ट हटाने की इजाजत दी है.

नई दिल्ली: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति दी है. हरीश 2013 से कोमा में थे और लाइफ सपोर्ट पर जी रहे थे. यह भारत में पहला ऐसा मामला है जहां कोर्ट ने स्पष्ट रूप से लाइफ सपोर्ट हटाने की इजाजत दी. इससे इच्छामृत्यु पर बहस फिर तेज हो गई है.
पैसिव यूथेनेशिया क्या है?
पैसिव यूथेनेशिया में टर्मिनल बीमारी या स्थायी वेजिटेटिव स्टेट वाले मरीज के लाइफ सपोर्ट सिस्टम (जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाएं) को हटा दिया जाता है. इससे मरीज की प्राकृतिक मौत हो जाती है. कोई सक्रिय दवा या इंजेक्शन नहीं दिया जाता. यह मरीज की इच्छा, परिवार की सहमति या कोर्ट की मंजूरी पर आधारित होता है. कई देश इसे मरीज के अधिकार के रूप में मानते हैं.
एक्टिव यूथेनेशिया क्या है?
एक्टिव यूथेनेशिया में डॉक्टर मरीज की सहमति से दवा या इंजेक्शन देकर मौत का कारण बनते हैं. यह गरिमामयी मौत के लिए किया जाता है, लेकिन ज्यादातर देशों में इसे हत्या माना जाता है और अवैध है. कुछ देशों में सख्त नियमों के साथ यह वैध है.
भारत में इच्छामृत्यु के नियम
भारत में पैसिव यूथेनेशिया 2018 के सुप्रीम कोर्ट फैसले (कॉमन कॉज केस) से वैध है. कोर्ट ने इसे अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का हिस्सा माना. टर्मिनली इल या PVS में मरीज को अनावश्यक पीड़ा से मुक्त करने का अधिकार है.
लिविंग विल (अग्रिम निर्देश) की व्यवस्था भी है, लेकिन एक्टिव यूथेनेशिया पूरी तरह अवैध है और IPC की धारा 302/304 के तहत हत्या माना जा सकता है. हरीश राणा केस में कोर्ट ने पहली बार इसे लागू किया, जहां दो मेडिकल बोर्ड की राय के बाद लाइफ सपोर्ट हटाने की इजाजत मिली.
अन्य देशों में स्थिति
कई देश पैसिव यूथेनेशिया को वैध मानते हैं, जैसे अमेरिका के कुछ राज्य, ब्रिटेन, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया के राज्य और कनाडा.
एक्टिव यूथेनेशिया वैध देश: नीदरलैंड्स (2002 से पहला देश), बेल्जियम, लक्जमबर्ग, स्पेन, कनाडा, कोलंबिया, न्यूजीलैंड, पुर्तगाल, इक्वाडोर, उरुग्वे और ऑस्ट्रेलिया के कई राज्य. स्विट्जरलैंड में असिस्टेड सुसाइड (डॉक्टर दवा देता है, मरीज खुद लेता है) वैध है. ये देश सख्त शर्तें रखते हैं, जैसे मरीज की स्पष्ट सहमति, उम्र, असहनीय पीड़ा और मेडिकल जांच.
भारत और अन्य देशों में मुख्य अंतर
भारत में केवल पैसिव यूथेनेशिया वैध है, एक्टिव नहीं. कारण नैतिक, धार्मिक और 'स्लिपरी स्लोप' का डर है, जहां कमजोर लोगों का शोषण हो सकता है. अन्य देशों में एक्टिव रूप भी वैध है, जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ज्यादा महत्व दिया जाता है. भारत में कोर्ट और मेडिकल बोर्ड की भूमिका बड़ी है, जबकि कई देशों में कानून से सीधे प्रक्रिया होती है.


