यूनुस की जल्दबाजी! अमेरिका से गुप्त समझौते पर हस्ताक्षर से बांग्लादेशी निर्यातक परेशान

बांग्लादेश में अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर बेचैनी बढ़ती जा रही है. ढाका और वाशिंगटन के बीच होने वाला यह समझौता पूरी तरह गोपनीय रखा गया है.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

एक ओर जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के साथ व्यापार समझौते की घोषणा कर चुके हैं. वहीं, दूसरी ओर पड़ोसी देश बांग्लादेश में अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर बेचैनी बढ़ती जा रही है. ढाका और वाशिंगटन के बीच होने वाला यह समझौता पूरी तरह गोपनीय रखा गया है, जिससे न केवल इसकी शर्तों पर बल्कि इसकी वैधता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. खास बात यह है कि यह समझौता ऐसे समय में किया जा रहा है, जब देश में चुनाव नजदीक हैं और सत्ता में एक गैर-निर्वाचित अंतरिम सरकार मौजूद है.

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार पर क्या आरोप?  

मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार पर आरोप है कि उसे अमेरिकी प्रभावशाली तंत्र का समर्थन प्राप्त है और 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को हटाने की घटनाओं में अंतरराष्ट्रीय तथा इस्लामी ताकतों की भूमिका रही. ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यूनुस प्रशासन को इस तरह के दीर्घकालिक और बाध्यकारी समझौते पर हस्ताक्षर करने का नैतिक या संवैधानिक अधिकार है.

समझौते की गोपनीयता ने बांग्लादेश के निर्यातकों, खासकर कपड़ा और रेडीमेड गारमेंट उद्योग से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ा दी है. अमेरिका को होने वाले बांग्लादेशी निर्यात में 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा वस्त्र और परिधान क्षेत्र का है. पहले से ही अमेरिकी टैरिफ नीति के कारण यह उद्योग दबाव में है और आशंका जताई जा रही है कि इस नए समझौते की शर्तें हालात को और खराब कर सकती हैं. यदि निर्यात प्रभावित हुआ तो इसका सीधा असर लाखों नौकरियों और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

इस समझौते की टाइमिंग भी विवादों में है. रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका-बांग्लादेश व्यापार समझौते पर 9 फरवरी को हस्ताक्षर किए जाने की तैयारी है, जबकि इसके महज तीन दिन बाद देश में आम चुनाव होने हैं. स्थानीय मीडिया का कहना है कि समझौते के मसौदे की जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, क्योंकि यूनुस सरकार पहले ही अमेरिका के साथ एक गोपनीयता समझौते पर दस्तखत कर चुकी है.

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अनु मुहम्मद ने उठाए सवाल 

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अनु मुहम्मद ने इस जल्दबाजी और अपारदर्शिता पर कड़ा सवाल उठाया है. उन्होंने कहा कि चुनाव से ठीक पहले बंदरगाह पट्टे, हथियार आयात और अमेरिका के साथ अधीनता जैसे समझौतों पर हस्ताक्षर करना संदेह पैदा करता है. उनका आरोप है कि ये फैसले विदेशी लॉबिस्टों के दबाव में लिए जा रहे हैं, जिन्हें यूनुस सरकार में सलाहकार की भूमिका दी गई है.

इस बीच यह भी आरोप सामने आए हैं कि यूनुस को जमात-ए-इस्लामी के समर्थन से अंतरिम सरकार का नेतृत्व सौंपा गया. माना जा रहा है कि आगामी चुनावों में जमात की अहम भूमिका हो सकती है. इसी संदर्भ में शेख हसीना के बेटे साजीब वाजेद ने चुनाव को दिखावटी बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य विदेशी हितों के अनुकूल एक कमजोर सरकार बनाना है.

अमेरिकी टैरिफ नीति अहम

व्यापार समझौते की पृष्ठभूमि में अमेरिकी टैरिफ नीति भी अहम है. अप्रैल 2025 में अमेरिका ने बांग्लादेश पर 37 प्रतिशत शुल्क लगाया था, जिसे बाद में घटाकर 35 और फिर 20 प्रतिशत किया गया. अब उम्मीद की जा रही थी कि बातचीत के बाद टैरिफ और कम होंगे, लेकिन समझौते की शर्तें गोपनीय होने के कारण निर्यातकों को कोई स्पष्टता नहीं मिल पा रही है.

बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि इस पूरे मामले में उद्योग से कोई परामर्श नहीं लिया गया. वहीं, नीति विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के बाद निर्वाचित सरकार को इस समझौते को लागू करना पड़ेगा, जबकि बातचीत में उसकी कोई भूमिका नहीं रही.

कुल मिलाकर, अमेरिका-बांग्लादेश व्यापार समझौता न केवल अपनी गोपनीय प्रकृति बल्कि समय और परिस्थितियों के कारण भी विवादों में घिर गया है. देश की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले वस्त्र उद्योग पर इसके दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं. यही वजह है कि यह समझौता अब बांग्लादेश में उद्योगपतियों, निर्यातकों और बुद्धिजीवियों के बीच गंभीर चिंता का विषय बन चुका है.

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