अमेरिका-ईरान जंग से तेहरान में गिर रही जहरीली काली बारिश, मिट्टी-पानी-हवा सब दूषित, वैज्ञानिकों ने किया अलर्ट
ईरान और अमेरिका के बीच जारी युद्ध से तेहरान और करज के आसपास तेल डिपो, रिफाइनरी और ईंधन स्टोरेज साइटों पर ‘ब्लैक रेन’ यानी काली और जहरीली बारिश पड़ने लगी है.

नई दिल्ली: ईरान-अमेरिका-इजराइल संघर्ष अब सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं रह गया है. यह एक गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट बन चुका है. मार्च 2026 में तेहरान और करज के आसपास तेल डिपो, रिफाइनरी और ईंधन स्टोरेज साइटों पर हुए हमलों के बाद ‘ब्लैक रेन’ यानी काली और जहरीली बारिश पड़ने लगी है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका असर कई दशकों तक रह सकता है.
ब्लैक रेन क्या है और कैसे बनती है?
तेहरान के प्रमुख तेल ठिकानों पर हमलों के बाद लाखों लीटर कच्चा तेल जल गया. अधूरी जलन की वजह से भारी मात्रा में काला धुआं, कार्बन कण और तेल के सूक्ष्म कण हवा में फैल गए. कम दबाव वाले मौसम में ये कण बादलों के पानी से मिल गए. जब बारिश हुई तो काली, चिपचिपी और अम्लीय बूंदें जमीन पर गिरी. इसे ही ब्लैक रेन कहा जा रहा है.
ब्लैक रेन में है खतरनाक तत्व
- PM2.5 और बेहद छोटे कण जो फेफड़ों के अंदर तक पहुंच जाते हैं.
- सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जो एसिड रेन बनाते हैं.
- पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAH)- कैंसर पैदा करने वाले केमिकल
- भारी धातुएं जैसे लेड, कैडमियम, क्रोमियम और निकल
- जहरीली गैसें और हाइड्रोकार्बन
विशेषज्ञों ने इसे टॉक्सिक और एसिडिक रेन बताया है. बच्चे, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं सबसे ज्यादा खतरे में हैं.
स्वास्थ्य पर तुरंत असर
तेहरान में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. PM2.5 का स्तर सामान्य सीमा से कई गुना ज्यादा है. कई लोगों ने इसे केमिकल अटैक जैसा माहौल बताया है. लोगों में ये लक्षण दिख रहे हैं:
- आंखों में जलन और लालिमा
- गले में खराश और लगातार खांसी
- सांस लेने में दिक्कत
- अस्थमा और COPD वाले मरीजों की हालत बिगड़ना
- त्वचा पर जलन और एलर्जी
लंबे समय तक रहने वाला खतरा
ब्लैक रेन सिर्फ तुरंत नुकसान नहीं पहुंचा रहा. PM2.5 कण खून में घुलकर हार्ट अटैक, स्ट्रोक और फेफड़ों की गंभीर बीमारियां बढ़ा रहे हैं. PAH और भारी धातुएं कैंसर का खतरा बढ़ाती हैं. मिट्टी और पानी भी दूषित हो रहे हैं. भारी धातुएं मिट्टी में जमा होकर फसलों को जहरीला बना रही है.
भूजल प्रभावित होने से खाने की चीजें भी दूषित हो सकती है. इससे अगली पीढ़ी पर भी असर पड़ सकता है. जैसे कि बच्चों के विकास में समस्या और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता.
जलवायु पर असर
युद्ध के पहले 14 दिनों में ही करीब 50 लाख टन CO₂ समकक्ष उत्सर्जन हुआ है. ब्लैक कार्बन ग्लेशियर पिघलाने में तेजी ला रहा है. वैज्ञानिक इसे 1991 के गल्फ वॉर से भी ज्यादा गंभीर बता रहे हैं क्योंकि प्रदूषण घनी आबादी वाले तेहरान शहर पर फैल रहा है.
यह जंग साबित कर रही है कि आधुनिक युद्ध का असर सिर्फ आज तक नहीं रहता. ब्लैक रेन एक धीमा जहर है जो हवा, पानी, मिट्टी और इंसानी शरीर को लंबे समय तक नुकसान पहुंचाएगा. युद्ध खत्म हो सकता है, लेकिन इसका प्रदूषण दशकों तक बना रह सकता है.


