सऊदी-पाक रक्षा समझौते के गोपनीय दस्तावेज हुए लीक, ईरान के खिलाफ बन रही नई रणनीति?
सऊदी अरब और पाकिस्तान के गुप्त रक्षा समझौते के लीक दस्तावेजों ने क्षेत्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है. इस खुलासे की टाइमिंग और इसके पीछे की रणनीति कई बड़े सवाल खड़े कर रही है.

पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर अचानक तेज हो गई है. सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए एक गुप्त रक्षा समझौते से जुड़े दस्तावेज लीक होने के बाद कई नए सवाल खड़े हो गए हैं. खास बात यह है कि यह खुलासा उसी समय किया गया, जब इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच अहम शांति वार्ता चल रही थी. ऐसे में इस कदम के पीछे की टाइमिंग ने पूरे मामले को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है.
जब इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि बातचीत कर रहे थे, उसी दौरान सऊदी अरब ने यह जानकारी सार्वजनिक कर दी कि पाकिस्तान वायुसेना के लड़ाकू विमान और अन्य सैन्य संसाधन रियाद पहुंच चुके हैं. सऊदी ने इसे दोनों देशों के बीच पिछले साल हुए रक्षा समझौते का हिस्सा बताया. इस खुलासे ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या सऊदी अरब ने जानबूझकर यह जानकारी उस समय साझा की, ताकि ईरानी प्रतिनिधिमंडल के मन में पाकिस्तान को लेकर शक पैदा हो सके.
गुप्त समझौते के अहम बिंदु
इस रक्षा समझौते को लेकर अब तक न तो पाकिस्तान और न ही सऊदी अरब ने आधिकारिक जानकारी दी थी. यहां तक कि पाकिस्तान की संसद में भी इस पर चर्चा नहीं हुई. यह पूरा मामला तब सामने आया जब ‘ड्रॉप साइट’ नाम की वेबसाइट पर इसके दस्तावेज लीक हुए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समझौते में ‘कलेक्टिव डिफेंस’ का प्रावधान शामिल है. यानी अगर किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा. यह व्यवस्था काफी हद तक NATO के आर्टिकल 5 जैसी है.
परमाणु हथियारों को लेकर असमंजस
लीक दस्तावेजों में यह भी संकेत मिला है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों तक पहुंच या उनकी सुरक्षा से जुड़ी गारंटी मांगी थी. हालांकि इस पर कोई स्पष्ट सहमति सामने नहीं आई है. बताया जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना इस मामले में सावधानी बरत रही थी और उसने परमाणु क्षमताओं को इस समझौते से अलग रखने की बात कही थी. इसके बावजूद यह साफ नहीं है कि भविष्य में इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाया जाएगा.
पुराने समझौतों की विरासत
दरअसल, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग कोई नया नहीं है. इसकी शुरुआत 1982 में एक गुप्त समझौते से हुई थी. बाद में 2005 में इसे ‘मिलिट्री कोऑपरेशन एग्रीमेंट’ (MCA) के रूप में अपडेट किया गया. 2025 में हुआ नया समझौता उसी MCA का विस्तारित रूप माना जा रहा है. लेकिन इसमें सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब दोनों देशों की सुरक्षा सीधे तौर पर एक-दूसरे से जुड़ गई है.
पाकिस्तान के भीतर भी मतभेद
इस समझौते को लेकर पाकिस्तान की सेना के अंदर भी मतभेद सामने आए हैं. कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने चेतावनी दी थी कि यह समझौता सऊदी अरब के पक्ष में ज्यादा झुका हुआ है और इससे पाकिस्तान पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आ जाएगी. उनका मानना था कि अगर सऊदी अरब पर हमला होता है, तो पाकिस्तान को सीधे युद्ध में उतरना पड़ सकता है, जिससे उसकी अपनी सुरक्षा और रणनीति प्रभावित हो सकती है.
दस्तावेजों के अनुसार, यदि ईरान सऊदी के तेल ठिकानों या अन्य बुनियादी ढांचे पर हमला करता है, तो पाकिस्तान को सैन्य हस्तक्षेप करना होगा. पहले से ही हजारों पाकिस्तानी सैनिक सऊदी अरब में तैनात हैं. लेकिन नए समझौते के बाद उनकी संख्या और भूमिका दोनों में बढ़ोतरी हो सकती है.
समझौते के पीछे असली कारण
हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यह समझौता कतर पर संभावित हमलों की आशंका को देखते हुए किया गया था, लेकिन असल में इसका मुख्य कारण ईरान का खतरा ही बताया जा रहा है. इतिहास भी यही बताता है कि 1980 के दशक से अब तक सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए ज्यादातर रक्षा सहयोग ईरान को ध्यान में रखकर ही बनाए गए हैं.


