भारत-US-फ्रांस मिलकर बढ़ा सकते हैं ड्रैगन की मुश्किलें! सामने आई चीन की सबसे बड़ी कमजोरी
नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने चीन की समुद्री रणनीति को लेकर बड़ा खुलासा किया है. हिंद महासागर में बढ़ती सैन्य हलचल और ऊर्जा सप्लाई के खतरे ने दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है.

नई दिल्ली: दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों के बीच हिंद महासागर अब सिर्फ व्यापार का रास्ता नहीं रह गया है, बल्कि यह रणनीतिक मुकाबले का सबसे बड़ा मैदान बनता जा रहा है. लंबे समय तक चीन को लगता रहा कि उसकी सबसे बड़ी समुद्री कमजोरी मलक्का जलडमरूमध्य है, लेकिन अब एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने तस्वीर बदल दी है. रिपोर्ट के मुताबिक चीन के लिए असली खतरा मलक्का नहीं, बल्कि उससे हजारों किलोमीटर दूर ईरान के पास मौजूद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है. यही वह जगह है जहां से चीन की ऊर्जा सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती शुरू होती है.
यह खुलासा लंदन स्थित सुरक्षा संस्था इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (IISS) की नई रिपोर्ट में किया गया है. यह रिपोर्ट सिंगापुर में होने वाले बड़े सुरक्षा सम्मेलन शांगरी-ला डायलॉग से ठीक पहले सामने आई है. रिपोर्ट का नाम “एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सुरक्षा मूल्यांकन” रखा गया है.
चीन की तेल निर्भरता क्यों है इतनी अहम
चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. उसकी फैक्ट्रियां, उद्योग, ट्रांसपोर्ट और ऊर्जा व्यवस्था बड़े पैमाने पर तेल पर निर्भर करती है. चीन अपनी जरूरत का बहुत बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से मंगाता है. यह तेल समुद्री जहाजों के जरिए चीन तक पहुंचता है और इसी रास्ते पर उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक चिंता छिपी हुई है. तेल लेकर आने वाले जहाज सबसे पहले ईरान और ओमान के बीच स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरते हैं. इसके बाद वे हिंद महासागर में प्रवेश करते हैं और भारत के समुद्री क्षेत्र के पास से आगे बढ़ते हुए मलक्का जलडमरूमध्य तक पहुंचते हैं. वहां से यह जहाज पूर्वी एशिया होते हुए चीन पहुंचते हैं.
मलक्का नहीं, अब होर्मुज बना असली चिंता
अब तक दुनिया के रणनीतिक विशेषज्ञ मानते थे कि चीन की सबसे कमजोर कड़ी मलक्का जलडमरूमध्य है. यह रास्ता बेहद संकरा है और चीन के व्यापार के लिए बहुत अहम माना जाता है. अगर कभी यह रास्ता बंद हो जाए तो चीन की ऊर्जा आपूर्ति पर भारी असर पड़ सकता है. इसी वजह से “मलक्का दुविधा” शब्द काफी चर्चा में रहा. लेकिन IISS की नई रिपोर्ट ने इस सोच को बदल दिया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बढ़ता है या यह रास्ता बाधित होता है, तो तेल हिंद महासागर तक पहुंच ही नहीं पाएगा. ऐसे में मलक्का तक तेल पहुंचने का सवाल ही खत्म हो जाएगा.
होर्मुज में बढ़ती सैन्य हलचल
रिपोर्ट में इस साल हुए एक अहम नौसैनिक अभ्यास का भी जिक्र किया गया है. चीन, रूस और ईरान ने मिलकर “समुद्री सुरक्षा बेल्ट 2026” नाम से संयुक्त युद्धाभ्यास किया था. यह अभ्यास होर्मुज क्षेत्र में आयोजित हुआ. इसके कुछ समय बाद ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव बढ़ गया. इस टकराव का असर समुद्री जहाजों की आवाजाही और तेल सप्लाई पर भी दिखाई दिया. इससे यह साफ हो गया कि होर्मुज दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री इलाकों में से एक बन चुका है.
हिंद महासागर में चार बड़ी ताकतें
रिपोर्ट के अनुसार हिंद महासागर में इस समय चार बड़े खिलाड़ी सक्रिय हैं- भारत, फ्रांस, अमेरिका और चीन. भारत इस पूरे क्षेत्र को अपनी रणनीतिक प्राथमिकता मानता है. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने नौसैनिक अभ्यास बढ़ाए हैं और कई देशों के साथ रक्षा सहयोग मजबूत किया है. भारत खुद को हिंद महासागर क्षेत्र का भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार बनाने की कोशिश कर रहा है. फ्रांस भी इस इलाके में मजबूत मौजूदगी रखता है. उसके पास अफ्रीका और रियूनियन द्वीप पर सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, जिससे पश्चिमी हिंद महासागर में उसकी पकड़ मजबूत बनी हुई है.
अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत डिएगो गार्सिया द्वीप पर मौजूद उसका सैन्य अड्डा है. यहां से वह हिंद महासागर की गतिविधियों पर नजर रखता है और अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर रणनीतिक संतुलन बनाए रखता है. वहीं चीन अभी इस क्षेत्र में नया खिलाड़ी माना जाता है. हालांकि उसकी नौसेना तेजी से मजबूत हुई है, लेकिन हिंद महासागर में उसका प्रभाव अभी भी बाकी देशों जितना मजबूत नहीं माना जाता.
चीन कैसे बढ़ा रहा है अपनी पकड़
चीन यह समझ चुका है कि वह फिलहाल सीधे तौर पर अमेरिका, भारत और फ्रांस जैसी ताकतों को चुनौती नहीं दे सकता. इसलिए वह दूसरे देशों के साथ रिश्ते मजबूत करने की रणनीति अपना रहा है. चीन हिंद महासागर के आसपास के देशों में बंदरगाह, सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश कर रहा है. साथ ही वह हथियारों की बिक्री और संयुक्त सैन्य अभ्यासों के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.


