अमेरिकी कोस्ट गार्ड में स्वास्तिक पर विवाद, जानें हिटलर ने क्यों चुना यह प्रतीक

अमेरिका के न्यू जर्सी स्थित कोस्ट गार्ड के ट्रेनिंग सेंटर में दीवार पर बने एक स्वास्तिक जैसे चिन्ह ने विवाद खड़ा कर दिया. इस घटना ने नाजी प्रतीक और भारतीय धार्मिक स्वास्तिक के बीच के अंतर को लेकर फिर से वैश्विक बहस छेड़ दी है. सवाल उठ रहा है कि एडॉल्फ हिटलर ने आखिर इसी चिन्ह को अपने झंडे के लिए क्यों चुना.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: अमेरिका के न्यू जर्सी स्थित एक सैन्य प्रशिक्षण केंद्र की दीवार पर बने एक चिन्ह ने इतिहास, धर्म और विचारधारा को लेकर नई बहस छेड़ दी है. देखने में साधारण लगने वाला यह निशान इतना संवेदनशील साबित हुआ कि पूरे संस्थान में हलचल मच गई. मामला अमेरिकी कोस्ट गार्ड के केप मे स्थित ट्रेनिंग सेंटर का है, जहां बाथरूम की दीवार पर बना एक चिन्ह नाजी प्रतीक जैसा दिखाई दिया.

यह घटना केवल एक आकृति तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने उस ऐतिहासिक विरोधाभास को भी सामने ला दिया, जिसमें एक ही चिन्ह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बिल्कुल अलग अर्थ रखता है. जहां पश्चिमी देशों में इसे नफरत और हिंसा से जोड़ा जाता है, वहीं भारत और एशिया के कई हिस्सों में यही चिन्ह आस्था और शुभता का प्रतीक माना जाता है.

कोस्ट गार्ड ट्रेनिंग सेंटर में निशान से मचा हड़कंप

न्यू जर्सी के केप मे स्थित United States Coast Guard के ट्रेनिंग सेंटर में यह मामला तब सामने आया, जब एक इंस्ट्रक्टर ने बाथरूम की दीवार पर संदिग्ध चिन्ह देखा. उसे यह सामान्य प्रतीक नहीं लगा और उसने तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी.

मामले की गंभीरता को देखते हुए चिन्ह को तुरंत मिटा दिया गया और जांच की जिम्मेदारी Coast Guard Investigative Service (CGIS) को सौंपी गई. अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि नफरत या चरमपंथी सोच को बढ़ावा देने वाले किसी भी प्रतीक को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

करीब 900 रिक्रूट और स्टाफ से पूछताछ की गई. वरिष्ठ अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर स्पष्ट संदेश दिया कि संस्था में घृणा फैलाने वाली विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं है.

नाजी प्रतीक से क्यों जुड़ा यह चिन्ह

पश्चिमी देशों में स्वास्तिक जैसी आकृति को देखते ही उसे नाजी प्रतीक के रूप में पहचाना जाता है. इसका कारण 20वीं सदी का इतिहास है. जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर और उनकी नाजी पार्टी ने 1920 में अपने झंडे में इस चिन्ह को शामिल किया. लाल, सफेद और काले रंग के बीच केंद्र में बनी यह आकृति उनकी विचारधारा का प्रतीक बनी.

हिटलर ने इसे तथाकथित 'आर्य नस्ल' की श्रेष्ठता का चिन्ह बताया. नाजी शासन के दौरान लाखों यहूदियों के नरसंहार और द्वितीय विश्व युद्ध की भयावह घटनाओं ने इस प्रतीक को स्थायी रूप से नफरत और हिंसा से जोड़ दिया. यही कारण है कि आज पश्चिमी देशों में यह चिन्ह दर्द और त्रासदी की याद दिलाता है.

भारत में स्वास्तिक का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

इतिहास को और पीछे ले जाएं तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है. स्वास्तिक नाजी प्रतीक से हजारों वर्ष पुराना है. ‘स्वास्तिक’ शब्द संस्कृत से आया है, जिसका अर्थ है कल्याण, शुभ और मंगलकारी.

भारत, चीन, जापान सहित एशिया के कई हिस्सों में यह चिन्ह प्राचीन काल से उपयोग में रहा है. हिंदू धर्म में इसे भगवान सूर्य, शुभारंभ और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है. घर के द्वार पर स्वास्तिक बनाना शुभ समझा जाता है. विवाह, पूजा और त्योहारों में इसका विशेष स्थान है.

जैन धर्म में यह तीर्थंकरों का प्रतीक है, जबकि बौद्ध धर्म में इसे बुद्ध के पदचिह्नों से जोड़ा जाता है. इस प्रकार जहां पश्चिम में यह घृणा का प्रतीक बन गया, वहीं भारत में यह आस्था और सकारात्मकता का चिह्न है.

दुनिया की प्राचीन सभ्यताओं में भी मौजूद था स्वास्तिक

स्वास्तिक केवल भारतीय परंपरा तक सीमित नहीं रहा. पुरातत्वविदों को यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका की प्राचीन सभ्यताओं में भी यह चिन्ह मिला है. प्राचीन ग्रीस और रोम में इसे सजावट के रूप में उपयोग किया जाता था. अमेरिका की कुछ जनजातियों ने भी इसे अपनाया था.

करीब 15,000 वर्ष पुराने अवशेषों में भी यह आकृति पाई गई है. कई स्थानों पर इसे सूर्य का प्रतीक माना गया, तो कहीं इसे जीवन के चक्र का संकेत समझा गया. इससे स्पष्ट है कि मूल रूप से यह एक सकारात्मक चिन्ह था.

हिटलर ने क्यों चुना स्वास्तिक

19वीं सदी में कुछ यूरोपीय विद्वानों ने 'आर्य नस्ल' की अवधारणा पेश की थी. उनके अनुसार एक प्राचीन श्रेष्ठ नस्ल ने दुनिया के कई हिस्सों में सभ्यता का प्रसार किया. बाद में यह सिद्धांत गलत साबित हुआ, लेकिन उस दौर में यह काफी लोकप्रिय था.

एडॉल्फ हिटलर और उनके समर्थकों ने इसी अवधारणा को अपनाया. उन्हें लगा कि स्वास्तिक उस कथित आर्य पहचान का प्रतीक है. हिटलर का मानना था कि एक प्रभावशाली प्रतीक लोगों को एकजुट कर सकता है.

संस्कृत में 'आर्य' शब्द का अर्थ है सम्मानित या श्रेष्ठ आचरण वाला व्यक्ति. इसका किसी नस्ल विशेष से संबंध नहीं था. लेकिन यूरोप में इसे नस्लीय पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया. इसी गलत व्याख्या ने नाजी विचारधारा को जन्म दिया और स्वास्तिक को नफरत के प्रतीक से जोड़ दिया.

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