फिलिस्तीन को मान्यता देने जा रहा फ्रांस, भारत पहले ही कर चुका ये काम

फ्रांस ने एक बड़ा कूटनीतिक फैसला लेते हुए फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की घोषणा की है. राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि वे इस निर्णय को सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश करेंगे. इस कदम से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मच गई है. ऐसे में सवाल उठता है कि भारत का इस मुद्दे पर क्या रुख है. क्या भारत पहले ही फिलिस्तीन को मान्यता दे चुका है? आइए जानते हैं...

Shivani Mishra
Edited By: Shivani Mishra

India Palestine relations: फ्रांस ने एक ऐतिहासिक और अहम कूटनीतिक कदम उठाते हुए फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की घोषणा कर दी है. राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस निर्णय को वह आगामी सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में औपचारिक रूप से प्रस्तुत करेंगे. फ्रांस के इस फैसले से पश्चिम एशिया में नई बहस छिड़ गई है, वहीं इजरायल और अमेरिका ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है.

इस फैसले के साथ फ्रांस उन 142 देशों की सूची में शामिल हो गया है, जिन्होंने अब तक फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी है. वहीं भारत की बात करें, तो उसका रुख लंबे समय से फिलिस्तीनी स्वतंत्रता के पक्ष में रहा है. भारत न सिर्फ फिलिस्तीन को मान्यता दे चुका है, बल्कि विभिन्न वैश्विक मंचों पर उसके आत्मनिर्णय और अधिकारों की लगातार पैरवी करता आया है.

भारत ने कब दी फिलिस्तीन को मान्यता?

भारत ने वर्ष 1988 में फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी. इससे पहले, 1974 में भारत पहला गैर-अरब देश बना जिसने फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन (PLO) को फिलिस्तीनी जनता का एकमात्र और वैध प्रतिनिधि माना था. 1996 में भारत ने गाजा में अपना प्रतिनिधि कार्यालय खोला, जिसे 2003 में रामल्ला स्थानांतरित कर दिया गया.

फिलिस्तीन को लेकर भारत की विदेश नीति

भारत की विदेश नीति में फिलिस्तीन का समर्थन एक मजबूत स्तंभ रहा है. भारत ने संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न प्रस्तावों का समर्थन किया है जिनमें फिलिस्तीनी जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार (Res.79/163, 2024), फिलिस्तीन मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान (A/Res/79/82, 2024) और शरणार्थियों की संपत्तियों एवं राजस्व (A/Res/78/75, 2023) से जुड़े प्रस्ताव शामिल हैं.

वहीं अप्रैल 2024 में, भारत ने मानवाधिकार परिषद के उस प्रस्ताव का भी समर्थन किया जो फिलिस्तीनियों के आत्मनिर्णय के अधिकार से संबंधित था. अक्टूबर 2023 से गाजा संकट के बाद भारत ने क्षेत्रीय और वैश्विक बैठकों में सक्रिय भूमिका निभाई है – जिनमें NAM मंत्रीस्तरीय बैठक (जनवरी 2024), काहिरा मानवीय सम्मेलन (फरवरी 2024) और अम्मान उच्चस्तरीय सम्मेलन (2024) शामिल हैं.

भारत-फिलिस्तीन संबंधों में उच्चस्तरीय दौरे

भारत और फिलिस्तीन के बीच उच्चस्तरीय दौरे लगातार होते रहे हैं. फरवरी 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिलिस्तीन की ऐतिहासिक यात्रा की थी. ये किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली फिलिस्तीन यात्रा थी. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी (2015), विदेश मंत्री सुषमा स्वराज (2016) और एम.जे. अकबर (2016) भी फिलिस्तीन की यात्राएं कर चुके हैं.

फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने 2005, 2008, 2010, 2012 और 2017 में भारत के दौरे किए. 2017 में उन्होंने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति के साथ बैठकें कीं. सितंबर 2024 में UNGA की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति अब्बास की मुलाकात भी हुई थी.

कोविड-19 महामारी के दौरान अप्रैल 2020 में प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति अब्बास से टेलीफोन पर बातचीत की थी. दिसंबर 2023 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने तत्कालीन फिलिस्तीनी प्रधानमंत्री मोहम्मद शताय्ये से फोन पर बातचीत कर भारत की पारंपरिक और स्थायी समर्थन की पुनः पुष्टि की थी.

फ्रांस के फैसले पर इजरायल और अमेरिका का विरोध

इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने फ्रांस के इस कदम को कड़ा विरोध जताते हुए कहा, "स्पष्ट रूप से कहूं तो, फिलिस्तीनी नहीं चाहते कि उनके पड़ोस में इजरायल जैसा कोई देश हो, वे इजरायल की जगह एक देश चाहते हैं." उन्होंने इसे आतंकवाद को इनाम देने जैसा करार दिया और चेतावनी दी कि इससे इजरायल पर हमले की नई जमीन तैयार हो सकती है.

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी फ्रांस की इस घोषणा की आलोचना करते हुए कहा, "अमेरिका मैक्रों के संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन देश को मान्यता देने की योजना को दृढ़ता से खारिज करता है. यह लापरवाह निर्णय 7 अक्टूबर के पीड़ितों के लिए एक तमाचा है."

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