ईरान ने यूरोपीय संघ की नौसेना और वायु सेना को घोषित किया 'आतंकवादी संगठन'

ईरान के विदेश मंत्रालय ने एक बड़ा कदम उठाते हुए यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की नौसेना और वायु सेनाओं को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

ईरान और यूरोपीय देशों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है. ईरान के विदेश मंत्रालय ने एक बड़ा कदम उठाते हुए यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की नौसेना और वायु सेनाओं को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है. ईरान का यह फैसला यूरोपीय संघ द्वारा ईरान की प्रमुख सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) को आतंकवादी सूची में शामिल करने के जवाब में लिया गया है.

ईरान के विदेश मंत्रालय ने बयान में क्या कहा?

ईरान के विदेश मंत्रालय ने शनिवार को जारी अपने आधिकारिक बयान में कहा कि यह कार्रवाई 2019 में पारित उस कानून के तहत की गई है, जिसे अमेरिका द्वारा आईआरजीसी को आतंकवादी घोषित किए जाने के बाद जवाबी उपाय के रूप में बनाया गया था. इस कानून के अनुच्छेद 7 में प्रावधान है कि जो भी देश या संगठन अमेरिका के इस फैसले का समर्थन करेगा या उसका अनुसरण करेगा, उसके खिलाफ ईरान पारस्परिक कार्रवाई करेगा.

ईरान ने अपने बयान में आईआरजीसी को देश की नियमित सशस्त्र सेनाओं का एक अहम हिस्सा बताया और यूरोपीय संघ के फैसले को अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूल सिद्धांतों के खिलाफ बताया. मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि अब यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की नौसेनाओं और वायु सेनाओं को भी इसी कानून के दायरे में लाया गया है और उन्हें आतंकवादी संगठन की श्रेणी में रखा जा रहा है.

विवाद कब गहराया?

यह विवाद उस समय और गहरा गया, जब 19 फरवरी 2026 को यूरोपीय संघ की परिषद ने आईआरजीसी को आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल करने का निर्णय लिया. यूरोपीय पक्ष का कहना है कि यह कदम ईरान में हाल के विरोध प्रदर्शनों पर कथित सख्ती और आईआरजीसी की अन्य गतिविधियों को देखते हुए उठाया गया है. आईआरजीसी की स्थापना 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद हुई थी और यह ईरान की सैन्य रणनीति, मिसाइल कार्यक्रम और परमाणु गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

ईरान इससे पहले भी अमेरिका के इसी तरह के फैसले के बाद जवाबी कदम उठा चुका है. अब यूरोपीय देशों के खिलाफ उठाया गया यह नया कदम दोनों पक्षों के संबंधों में और अधिक तनाव पैदा कर सकता है. खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका, इजराइल और उनके सहयोगी देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन को लेकर पहले से ही दबाव बनाए हुए हैं.

ईरान ने इस फैसले को अपनी संप्रभुता और सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया है, जबकि यूरोपीय देश इसे क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने की दिशा में उठाया गया कदम मान रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इस टकराव से आने वाले समय में कूटनीतिक संबंध और अधिक जटिल हो सकते हैं.

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